बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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( १३७७ )
| मन्त्रप्रतीकानि | अ० | ब्रा० | मं० | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| योऽग्नौ तिष्ठन् | ३ | ७ | ५ | ७५१ |
| यो दिक्षु तिष्ठन् | ३ | ७ | १० | ७५१ |
| यो दिवि तिष्ठन् | ३ | ७ | ८ | ७५१ |
| योऽन्तरिक्षे तिष्ठन् | ३ | ७ | ६ | ७५१ |
| योऽप्सु तिष्ठन् | ३ | ७ | ४ | ७५१ |
| यो मनसि तिष्ठन् | ३ | ७ | २० | ७५४ |
| योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुष० | ५ | ५ | ४ | १२०१ |
| यो रेतसि तिष्ठन् | ३ | ७ | २३ | ७५४ |
| यो वा एतदक्षरं | ३ | ८ | १० | ७७७ |
| यो वाचि तिष्ठन् | ३ | ७ | १७ | ७५४ |
| यो वायौ तिष्ठन् | ३ | ७ | ७ | ७५१ |
| यो विज्ञाने तिष्ठन् | ३ | ७ | २२ | ७५४ |
| यो वै स संवत्सरः | १ | ५ | १५ | ३६२ |
| योषा वा अग्निर्गौतम | ६ | २ | १३ | १२६६ |
| यो ह वा आयतनं वेद | ६ | १ | ५ | १२५४ |
| यो ह वै ज्येष्ठं च श्रेष्ठं च | ६ | १ | १ | १२४८ |
| यो ह वै प्रजातिं वेद | ६ | १ | ६ | १२५४ |
| यो ह वै प्रतिष्ठां वेद | ६ | १ | ३ | १२५१ |
| यो ह वै वसिष्ठां वेद | ६ | १ | २ | १२५० |
| यो ह वै शिशुं साधनं | २ | २ | १ | ५०२ |
| यो ह वै संपदं वेद | ६ | १ | ४ | १२५२ |
| रूपाण्येव यस्यायतनं...य एवायमादर्शे | ३ | ९ | १५ | ८०१ |
| रूपाण्येव...एवासावादित्ये | ३ | ९ | १२ | ७९८ |
| रेत एव यस्यायतनं | ३ | ९ | १७ | ८०३ |
| रेतस इति मा वोचत | ३ | ९ | ५-२८ | ८२८ |
| रेतो होच्चक्राम | ६ | १ | १२ | १२५६ |
| वाग्धोच्चक्राम | ६ | १ | ८ | १२५६ |
| वाग्वै ग्रहः | ३ | २ | ३ | ६५६ |
| वाचं धेनुमुपासीत | ५ | ८ | १ | १२०५ |
| विज्ञातं विजिज्ञास्यमवि० | १ | ५ | ८ | ३४६ |
| विद्युद्ब्रह्मेत्याहु० | ५ | ७ | १ | १२०४ |
| वेत्थ यथेमाः प्रजाः | ६ | २ | २ | १२७५ |
| शाकल्येति होवाच | ३ | ९ | १८ | ८०४ |
| श्रोत्रं वै ग्रहः | ३ | २ | ६ | ६५६ |
| श्रोत्रं होच्चक्राम | ६ | १ | १० | १२५८ |
| श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः | ६ | २ | १ | १२७३ |
बृ० उ० ८७-