भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 171

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १६५


होता है वह बतलाता है; क्योंकि इस सबसे पूर्ववर्ती उस [ आत्मासंज्ञक प्रजापति ] ने समस्त पापोंको उषित—दग्ध कर दिया था इसलिये यह पुरुष हुआ। जो ऐसी उपासना करता है वह उसे दग्ध कर देता है जो उससे पहले प्रजापति होना चाहता है ॥ १ ॥

आत्मैवात्मेति प्रजापतिः प्रथमोऽण्डजः शरीर्यभिधीयते। वैदिकज्ञानकर्मफलभूतः स एव। किम् ? इदं शरीरभेदजातं तेन प्रजापतिशरीरेणाविभक्तम्। आत्मैवासीदग्रे प्राक्शरीरान्तरोत्पत्तेः। स च पुरुषविधः पुरुषप्रकारः शिरःपाण्यादिलक्षणो विराट्।'आत्मैव'—यहाँ 'आत्मा' इस शब्दसे अण्डेसे उत्पन्न हुआ प्रथम शरीरी प्रजापति ही कहा जाता है। वही वैदिक ज्ञान और कर्मका फलभूत है। ऐसा क्यों है ? क्योंकि यह शरीरादि भेदसमुदाय उस प्रजापतिके शरीरसे अभिन्न है। कारण, शरीरान्तरकी उत्पत्तिसे पूर्व आत्मा ही था। वह पुरुषविध—पुरुषकी तरह शिर एवं हाथ-पैर आदि लक्षणवाला विराट् पुरुष था।
स एव प्रथमः सम्भूतोऽनुवीक्ष्यान्वालोचनं कृत्वा, कोऽहं किंलक्षणो वास्मीति, नान्यद्वस्त्वन्तरम् आत्मनः प्राणपिण्डात्मकार्यकरणरूपान्न अपश्यन्न ददर्श। केवलं त्वात्मानमेव सर्वात्मानमपश्यत्। तथा पूर्वजन्मश्रौतविज्ञानसंस्कृतः, सोऽहं प्रजापतिः सर्वात्माहमस्मीत्यग्रे व्याहरद्व्याहृतवान्। ततस्तस्माद्यतः पूर्वज्ञानसंस्काराद् आत्मानमेवाहमित्यभ्यधादग्रेप्रथम उत्पन्न हुए उस प्रजापतिने अन्वीक्ष्य—अन्वालोचन कर 'मैं कौन हूँ और कैसे लक्षणोंवाला हूँ' इत्यादि रूपसे विचारकर अपने प्राणसमुदायरूप देहेन्द्रियसंघातसे भिन्न कोई और पदार्थ नहीं देखा। केवल अपनेको ही सर्वात्मरूपसे देखा तथा पूर्वजन्मके 'वह मैं सर्वात्मा प्रजापति हूँ' इस श्रौतविज्ञानजनित संस्कारसे युक्त होनेके कारण सबसे पहले “अहमस्मि” ऐसा कहा। इसीसे, क्योंकि पूर्वज्ञानके संस्कारसे उसने आरम्भमें अपनेको 'अहम्' ऐसा