बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 221, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २१५
| अनात्मचिन्तानुपपत्तिः। पारिशेष्यादात्मचिन्तैव। तस्मात्तदुपासनमस्मिन्पक्षे न विधातव्यम्, प्राप्तत्वात्। | न रहनेसे अनात्मचिन्तनकी सम्भावना नहीं रहती। फलतः आत्मचिन्तन ही रह जाता है। अतः इस पक्षमें आत्मोपासनाका विधान करनेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह स्वतः प्राप्त है। |
|---|---|
| उक्तार्थमीमांसा<br>तिष्ठतु तावत्पाक्षिक्यात्मोपासनप्राप्तिर्नित्या वेति, अपूर्वविधिः स्यात्; ज्ञानोपासनयोरेकत्वे सत्यप्राप्तत्वात्। 'न स वेद' इति विज्ञानं प्रस्तुत्य 'आत्मेत्येवोपासीत' इत्यभिधानाद्वेदोपासनशब्दयोरेकार्थतावगम्यते। "अनेन ह्येतत्सर्वं वेद" "आत्मानमेवावेत्" (बृ० उ० १।४।१०) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च विज्ञानमुपासनम्। तस्य चाप्राप्तत्वाद्विध्येयत्वम्। | शङ्का—आत्मोपासनकी प्राप्ति पाक्षिक है अथवा नित्य है—इस विचारको अभी रहने दो, यह तो अपूर्वविधि ही है, क्योंकि यहाँ ज्ञान और उपासनाका एक ही अर्थ होनेके कारण वह स्वतः प्राप्त नहीं है। 'न स वेद' (वह नहीं जानता) इस वाक्यसे विज्ञानका आरम्भ कर 'आत्मेत्येवोपासीत' इस प्रकार कहनेके कारण यहाँ 'वेद' और 'उपासन' इन शब्दोंकी एकार्थता ज्ञात होती है। "इससे इस सबको जान लेता है" "आत्माको ही जाना" इत्यादि श्रुतियोंसे भी विज्ञान उपासनाहीका नाम है। और वह (उपासना) अप्राप्त होनेके कारण विधिकी योग्यता रखती है।¹ |
| न च स्वरूपान्वाख्याने पुरुषप्रवृत्तिरुपपद्यते, तस्मादपूर्व- | इसके सिवा स्वरूपके अनुवादमें पुरुषकी प्रवृत्ति होनी भी सम्भव नहीं |
१. क्योंकि उपासना मानस कर्म है, वह स्वतः प्राप्त नहीं होता; इसलिये उसके लिये विधिकी आवश्यकता है।