भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 367, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 367

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३६१


| मावास्यां रात्रिं प्राणभृतः प्राणिनः प्राणं न विच्छिन्द्यात्प्राणिनं न प्रमापयेदित्येतत्, अपि कृकलासस्य । कृकलासो हि पापात्मा स्वभावेनैव हिंस्यते प्राणिभिर्दृष्टोऽप्यमङ्गल इति कृत्वा । <br><br> ननु प्रतिषिद्धैव प्राणिहिंसा "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" (छा० उ० ८।१५।१) इति । <br><br> बाढं प्रतिषिद्धा, तथापि नामावास्याया अन्यत्र प्रतिप्रसवार्थं वचनं हिंसायाः कृकलासविषये वा, किं तर्हि ? एतस्याः सोमदेवताया अपचित्यै पूजार्थम् ॥१४॥ | अमावास्याकी रात्रिमें प्राणधारी यानी प्राणीके प्राणका विच्छेद न करे; अर्थात् प्राणीको न मारे। यहाँतक कि गिरगिटके भी प्राण न ले। गिरगिट पापी प्राणी है, इसलिये यह सोचकर कि यह देखनेसे भी अमङ्गलस्वरूप है, प्राणी स्वभावसे ही इसे मार डालते हैं [यहाँ उसकी भी हिंसाका निषेध है]। <br><br> शङ्का—परंतु "अहिंसन् सर्वभूतान्यन्यत्र तीर्थेभ्यः" इस वचनके अनुसार हिंसा तो सामान्यतः प्रतिषिद्ध ही है। [फिर यहाँ उसका अलग प्रतिषेध क्यों किया गया?] <br><br> समाधान—हाँ, प्रतिषिद्ध है, तथापि यहाँ जो श्रुतिका कथन है वह अमावास्यासे भिन्न समयमें सब प्राणियोंकी अथवा केवल गिरगिटकी हिंसाका प्रतिप्रसव (विशेष विधान) करनेके लिये नहीं है; तो फिर किस उद्देश्यसे है? इस सोम देवताकी अपचिति अर्थात् पूजाके लिये ही [यह कथन] है¹ ॥ १४॥ |


¹ यहाँ यह शङ्का होती है—श्रुतिमें सभी प्राणियोंकी हिंसाका निषेध करनेके लिये 'अहिंसन् सर्वभूतानि' यह सामान्य वचन है। इसके रहते हुए जो यहाँ 'अमावास्याकी रातमें गिरगिटतकका प्राण न ले' यह विशेष वचन श्रुतिमें कहा गया, इससे यह ध्वनि निकलती है कि अमावास्याके सिवा अन्य तिथियोंमें सभी