बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 458, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 458
४५२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| कुमारो वा अत्यन्तबालो वा, महाराजो वात्यन्तवश्यप्रकृतिर्यथोक्तकृत्, महाब्राह्मणो वा अत्यन्तपरिपक्वविद्याविनयसम्पन्नः, अतिघ्नीम्—अतिशयेन दुःखं हन्तीत्यतिघ्नी आनन्दस्यावस्था सुखावस्था तां प्राप्य गत्वा शयीतावतिष्ठेत। | प्रकार कुमार—अत्यन्त छोटा बालक, अथवा जिसकी प्रजा अत्यन्त वशमें की हुई है, ऐसा कोई शास्त्रोक्त आचरण करनेवाला महाराज, अथवा अत्यन्त परिपक्व विद्या-विनय-सम्पन्न महाब्राह्मण 'अतिघ्नीम्'—जो अतिशयरूपसे दुःखका घात कर देती है ऐसी जो अतिघ्नी आनन्दकी अवस्था यानी सुखावस्था है, उसको प्राप्त होकर शयन करे अर्थात् स्थित हो। |
| एषां च कुमारादीनां स्वभावस्थानां सुखं निरतिशयं प्रसिद्धं लोके, विक्रियमाणानां हि तेषां दुःखं न स्वभावतः; तेन तेषां स्वाभाविक्यवस्था दृष्टान्तत्वेनोपादीयते प्रसिद्धत्वात्। न तेषां स्वाप एवाभिप्रेतः, स्वापस्य दार्ष्टान्तिकत्वेन विवक्षितत्वाद्विशेषाभावाच्च। विशेषे हि सति दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकभेदः स्यात्; तस्मान्न तेषां स्वापो दृष्टान्तः। | अपने स्वभावमें स्थित इन कुमारादिका सुख लोकमें सबसे बढ़कर प्रसिद्ध है, उन्हें विकृत होनेपर ही दुःख होता है, स्वभावतः नहीं; अतः प्रसिद्ध होनेके कारण उनकी स्वाभाविक अवस्थाको दृष्टान्तरूपसे ग्रहण किया जाता है। यहाँ केवल उनकी सुषुप्तावस्थासे ही अभिप्राय नहीं है; क्योंकि सुषुप्तावस्था तो दार्ष्टान्तिकरूपसे ही ग्रहण की गयी है, इसलिये फिर तो दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकमें कोई विशेषता ही नहीं रहेगी। और दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिकका भेद किसी विशेषताके रहनेपर ही हो सकता है; इसलिये यहाँ उनकी सुषुप्ति दृष्टान्त नहीं है। |