भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 465, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 465
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४५९
शाङ्करभाष्यहिन्दी-अनुवाद
यस्मादात्मनः स्थावरजङ्गमं जगदिदमग्निविस्फुलिङ्गवद्व्युच्चरत्यनिशम्, यस्मिन्नेव च प्रलीयते जलबुद्बुद्वत्, यदात्मकं च वर्तते स्थितिकाले, तस्यास्यात्मनो ब्रह्मणः, उपनिषद्; उपसमीपं निगमयतीत्यभिधायकः शब्द उपनिषदित्युच्यते, शास्त्रप्रामाण्यादेतच्छब्दगतो विशेषोऽवसीयेत उपनिगमयितृत्वं नाम ।अग्निसे विस्फुलिङ्गोंके समान जिस आत्मासे यह चराचर जगत् अहर्निश उत्पन्न होता रहता है और जलमें बुलबुलेके समान जिसमें यह लीन हो जाता है तथा स्थितिकालमें जिस स्वरूपसे यह विद्यमान रहता है, उपनिषत् है; उप अर्थात् समीपसे निगमन करता है; इसलिये अभिधायक (वाचक) शब्द ही 'उपनिषद्' कहा जाता है, 'उपनिषद्' शब्दमें रहनेवाली यह उपनिगमनकर्तृत्वरूप विशेषता शास्त्रप्रामाण्यसे जानी जाती है ।
कासावुपनिषदित्याह—सत्यस्य सत्यमिति । सा हि सर्वत्र चोपनिषदलौकिकार्थत्वाद् दुर्विज्ञेयार्था, इति तदर्थमाचष्टे—प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यमिति । एतस्यैव वाक्यस्य व्याख्यानायोत्तरं ब्राह्मणद्वयं भविष्यति ।वह उपनिषद् क्या है, सो श्रुति बतलाती है—'सत्यका सत्य' यह वह विशेषता है । अलौकिक अर्थवाली होनेके कारण उस उपनिषद्का अर्थ सर्वत्र दुर्विज्ञेय है, इसलिये श्रुति उसका अर्थ बतलाती है—प्राण ही सत्य हैं, यह (आत्मा) उनका भी सत्य है । आगेके दो ब्राह्मण इसी वाक्यकी व्याख्या करनेके लिये होंगे ।
भवतु तावदुपनिषद्व्याख्यानाइयमुपनिषत् योत्तरं ब्राह्मणद्वयम्, किंविषयेति यस्योपनिषदित्युक्तम्, मीमांस्यते तन्न जानीमः किं प्रकृतस्यात्मनो विज्ञानमयस्य पाणि-पूर्व०—आगेके दो ब्राह्मण भले ही इस उपनिषद्की व्याख्या करनेके लिये हों, परंतु ऊपर जो यह कहा गया है कि 'यह उसकी उपनिषद् है' इसमें हम यह नहीं जानते कि यह उपनिषद् हाथ दबानेसे उठे हुए