भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 466
४६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| पेषणोत्थितस्य संसारिणः शब्दादिभुज इयमुपनिषदाहोस्वदंससारिणः कस्यचित् ? | शब्दादिका भोग करनेवाले प्रकृत विज्ञानमय संसारी आत्माकी है अथवा किसी असंसारीकी ? | | किञ्चातः ? | सिद्धान्ती—इससे तुम्हारा क्या प्रयोजन है ? | | यदि संसारिणस्तदा संसार्य्येव विज्ञेयः, तद्विज्ञानादेव सर्वप्राप्तिः। स एव ब्रह्मशब्दवाच्यस्तद्विद्यैव ब्रह्मविद्येति । अथ असंसारिणः, तदा तद्विषया विद्या ब्रह्मविद्या । तस्माच्च ब्रह्मविज्ञानात्सर्वभावापत्तिः । | पूर्व०—यदि यह उपनिषद् संसारीकी है, तब तो संसारी ही विशेषरूपसे ज्ञातव्य है, उसके विज्ञानसे ही सर्वभावकी प्राप्ति हो सकती है वही 'ब्रह्म' शब्दका वाच्य है तथा उसकी विद्या ही ब्रह्मविद्या है । और यदि वह असंसारीकी है तो असंसारी आत्मासे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ही ब्रह्मविद्या है, एवं उस ब्रह्मविज्ञानसे ही सर्वभावकी प्राप्ति होती है । | | सर्वमेतच्छास्त्रप्रामाण्याद्भविष्यति । किन्त्वस्मिन्पक्षे "आत्मेत्येवोपासीत" ( १ । ४ । ७ ) "आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि" ( १ । ४ । १४ ) इति परब्रह्मैकत्वप्रतिपादिकाः श्रुतयः कुप्येयुन्, संसारिणश्चान्यस्याभावे उपदेशानर्थक्यात् । यत एवं पण्डितानाम- | सिद्धान्ती—यह सब शास्त्रप्रामाण्यसे ही सिद्ध होगा । किंतु इस पक्षमें "ओत्मेत्येवोपासीत", "ओत्मानमेवावेदाहं ब्रह्मास्मि" इत्यादि परब्रह्मकी एकताका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियाँ बाधित हो जायँगी; क्योंकि ब्रह्मसे भिन्न किसी संसारीकी सत्ता न होनेके कारण उसका उपदेश निरर्थक होगा । इस प्रकार जिसका उत्तर नहीं दिया गया है, उस |


१. आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे ।
२. आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ ।