भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 476
४७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| यदैवं स्थितः शास्त्रार्थः, तदा जीवपरयोरभेदे परमात्मनः संसारिदोषोद्भावनम् त्वम्; तथा च सति शास्त्रानर्थक्यम्, असंसारित्वे चोपदेशानर्थक्यं स्पष्टो दोषः प्राप्तः। यदि तावत्परमात्मा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वशरीरसम्पर्कजनितदुःखान्यनुभवतीति स्पष्टं परस्य संसारित्वं प्राप्तम्। तथा च परस्यासंसारित्वप्रतिपादिकाः श्रुतयः कुप्येरन्, स्मृतयश्च, सर्वे च न्यायाः। अथ कथञ्चित्प्राणिशरीरसम्बन्धजैर्दुःखैर्न सम्बध्यत इति शक्यं प्रतिपादयितुं परमात्मनः साध्यपरिहार्याभावादुपदेशानर्थक्यदोषो न शक्यते निवारयितुम्।<br><br>अत्र केचित्परिहारमाचक्षते—<br>(जीवस्य परमात्मविकारत्वं प्रस्तूयते न)<br>परमात्मा न साक्षाद्भूतेष्वनुप्रविष्टः स्वेन रूपेण; किं तर्हि ? | जब इस प्रकार शास्त्रका अभिप्राय निश्चित होता है तो परमात्माका संसारी होना सिद्ध होता है; ऐसी स्थितिमें शास्त्र व्यर्थ हो जाता है और यदि जीवको असंसारी माना जाय तो उसे उपदेश करना व्यर्थ है—ऐसा यह स्पष्ट दोष प्राप्त होता है। यदि परमात्मा ही समस्त जीवोंका अन्तरात्मा है और वही समस्त शरीरोंके सम्पर्कसे होनेवाले दुःखोंको अनुभव करता है तो स्पष्ट ही परमात्माको संसारित्वकी प्राप्ति हो जाती है। ऐसी स्थितिमें परमात्माके असंसारित्वका प्रतिपादन करनेवाली समस्त श्रुतियाँ, स्मृतियाँ और युक्तियाँ बाधित हो जाती हैं, और यदि किसी प्रकार यह प्रतिपादन भी किया जाय कि प्राणियोंके शरीरोंके सम्बन्धसे होनेवाले दुःखोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता तो परमात्माके लिये कोई ग्राह्य या त्याज्य न होनेके कारण उपदेशकी व्यर्थतारूप दोषका निवारण नहीं किया जा सकता।<br><br>यहाँ कोई लोग इस दोषका इस प्रकार परिहार बतलाते हैं—परमात्मा साक्षात् अपने रूपसे भूतोंमें अनुप्रविष्ट नहीं है; तो फिर क्या बात |

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