बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 477, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४७१
| विकारभावमापन्नो विज्ञानात्मत्वं प्रतिपेदे । स च विज्ञानात्मा परस्मादन्योऽनन्यश्च । येनान्यः, तेन संसारित्वसम्बन्धी, येनानन्यः, तेन अहं ब्रह्मेत्यवधारणार्हः । एवं सर्वमविरुद्धं भविष्यतीति । <br><br> तत्र विज्ञानात्मनो विकारपक्षे एता गतयः—पृथिवीद्रव्यवदनेकद्रव्यसमाहारस्य सावयवस्य परमात्मन एकदेशविपरिणामो विज्ञानात्मा घटादिवत् । पूर्वसंस्थानावस्थस्य वा परस्यैकदेशो विक्रियते केशोषरादिवत्, सर्व एव वा परः परिणमेत्क्षीरादिवत् । | है? वह विकारभावको प्राप्त होकर विज्ञानात्मत्वको प्राप्त हुआ है और वह विज्ञानात्मा परमात्मासे भिन्न एवं अभिन्न भी है। चूँकि वह भिन्न है, इसलिये संसारित्वसे सम्बन्ध रखनेवाला है और अभिन्न होनेके कारण 'मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारके निश्चयकी योग्यता रखता है। इस प्रकार माननेसे [श्रुति, स्मृति एवं न्यायादि] सब अनुकूल रहेंगे। <br><br> तहाँ (इस सिद्धान्तके अनुसार) विज्ञानात्माको परमात्माका विकार माननेके पक्षमें तीन गतियाँ हो सकती हैं—(१) पृथिवी द्रव्यके समान अनेक द्रव्योंके संघात रूप सावयव परमात्माका विज्ञानात्मा घटादिकी तरह एकदेशी परिणाम है' (२) अथवा अपने पूर्वरूपमें स्थित परमात्माका एक ही देश केश या ऊषरभूमिके समान [विज्ञानात्मरूपसे] विकारको प्राप्त होता है, (३) अथवा दुग्धादिके समान सारा ही परमात्मा विकारको प्राप्त हो जाता है। | | (उक्तपक्षप्रतिषेधः) <br> तत्र समानजातीयानेकद्रव्यसमूहस्य कश्चिद् द्रव्यविशेषो विज्ञानात्मत्वं प्रतिपद्यते यदा, तदा समानजातीय- | इन पक्षोंमेंसे यदि [यह माना जाय कि] समान जातिवाले अनेक द्रव्योंके समुदायका कोई द्रव्यविशेष ही विज्ञानात्मत्वको प्राप्त होता है तो समानजातीय होनेके कारण उन |