बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 506, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ | | :--- | :--- |
| १।२।९)—वरप्रसादलभ्यत्व-श्रुतिस्मृतिवादेभ्यश्च; “तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके” ( ईशा० उ० ५ ) इत्यादि-विरुद्धधर्मसमवायित्वप्रकाशकमन्त्रवर्णेभ्यश्च। गीतासु च— “मत्स्थानि सर्वभूतानि” ( ९ । ४ ) इत्यादि। तस्मात्परब्रह्मव्यतिरेकेण संसारी नाम नान्यद्वस्त्वन्तरमस्ति। तस्मात्सुष्ठूच्यते “ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेद् अहं ब्रह्मास्मि” ( १ । ४ । १०) “नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ नान्यदतोऽस्ति श्रोतॄ” ( ३ । ८ । ११ ) इत्यादिश्रुतिशतेभ्यः। तस्मात्परस्यैव ब्रह्मणः ‘सत्यस्य सत्यम्’ नामोपनिषत्परा। २०। | है” तथा देवतादिके वर और कृपाद्वारा उसके प्राप्यत्वका प्रतिपादन करनेवाले श्रुति एवं स्मृतिसम्बन्धी वाक्योंसे एवं “वह चलता है और वह नहीं चलता, वह दूर है और वह समीप भी है” इत्यादि ब्रह्ममें विरुद्ध धर्मोंका समवायित्व प्रकाशन करनेवाले मन्त्रवर्णोंसे भी यही सिद्ध होता है। गीतामें भी कहा है— “सब भूत मुझमें स्थित हैं” इत्यादि। अतः परब्रह्मसे भिन्न संसारी नामकी कोई अन्य वस्तु नहीं है। इसलिये “पहले यह ब्रह्म ही था, उसने अपनेको जाना कि मैं ब्रह्म हूँ” “इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है और इससे भिन्न कोई श्रोता भी नहीं है” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियोंद्वारा ठीक ही कहा गया है। अतः ‘सत्यका सत्य है’ यह परम उपनिषद् परब्रह्मकी ही है॥ २०॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये प्रथममजातशत्रुब्राह्मणम् ॥ १ ॥
द्वितीय ब्राह्मण
| उपक्रमः | ‘ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि’ इति प्रस्तुतम्; तत्र यतो जगज्जातं यन्मयं | ‘मैं तुम्हें ब्रह्मका बोध कराऊँगा’ इस प्रकार यहाँ प्रसंग आरम्भ हुआ है। सो, जिससे जगत् उत्पन्न हुआ |
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