बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 531, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२५
| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| तस्य हैतस्य पुरुषस्य करुणात्मनो लिङ्गस्य रूपं वक्ष्यामो वासनामयं मूर्तामूर्तवासनाविज्ञानमयसंयोगजनितं विचित्रं पटभित्तिचित्रवन्मायेन्द्रजालमृगतृष्णिकोपमं सर्वव्यामोहास्पदम्—<br>एतावन्मात्रमेव आत्मेति विज्ञानवादिनो वैनाशिका यत्र भ्रान्ताः, एतदेव वासनारूपं पटरूपवदात्मनो द्रव्यस्य गुण इति नैयायिका वैशेषिकाश्च सम्प्रतिपन्नाः, इदमात्मार्थं त्रिगुणं स्वतन्त्रं प्रधानाश्रयं पुरुषार्थेन हेतुना प्रवर्तत इति साङ्ख्याः। | उस इस इन्द्रियात्मा लिङ्गशरीररूप पुरुषके वासनामय, मूर्तामूर्त स्वरूपकी वासना और विज्ञानमयके संयोगसे उत्पन्न हुए वस्त्र या भित्तिपर लिखे हुए चित्रके समान विचित्र तथा माया-इन्द्रजाल एवं मृगतृष्णाके समान सब प्रकारके व्यामोहके आश्रयभूत रूपका वर्णन करते हैं, जिसमें कि विज्ञानवादी वैनाशिकोंको ऐसा भ्रम हो गया है कि बस इतना ही आत्मा है, नैयायिक और वैशेषिक ऐसा मानने लगे हैं कि यह वासनारूप ही पटके रूपके समान 'आत्मा' नामक द्रव्यका गुण है तथा सांख्यवादियोंका मत है कि यह तीन गुणवाला, स्वतन्त्र एवं प्रधानरूप आश्रयवाला [अन्तःकरण] पुरुषार्थके हेतुसे आत्माके लिये प्रवृत्त होता है। |
| (भर्तृप्रपञ्चमतोपन्यासः)<br>औपनिषद्ममन्या अपि केचित्प्रक्रियां रचयन्ति—<br>मूर्तामूर्तराशिरेकः, परमात्मराशिरुत्तमः ताभ्यामन्योऽयं मध्यमः किल तृतीयः कर्त्रा भोक्त्रा विज्ञानमयेन अजातशत्रुप्रतिबोधितेन सह विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञासमुदायः, प्रयोक्ता | कोई-कोई अपनेको उपनिषद्-सिद्धान्तावलम्बी माननेवाले भी ऐसी प्रक्रिया रचते हैं—एक तो मूर्तामूर्त-राशि है और दूसरी परमात्मसंज्ञक उत्तम राशि है! तथा अजातशत्रुद्वारा जगाये हुए कर्ता, भोक्ता विज्ञानमयके साथ जो विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञाका समुदाय है, वह पूर्वोक्त दोनोंसे भिन्न तीसरी मध्यम राशि है। [विद्या, पूर्वप्रज्ञा और] कर्मका |