भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 555, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 555

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५४७


नामृता स्याम्, किम॒हं तेन वि॒त्तेन कुर्याम् ? यदेव भगवान्केवलममृतत्वसाधनं वेद, तदेवामृतत्वसाधनं मे मह्यं ब्रूहि ॥ ३ ॥अमृत नहीं हो सकती, उस धनसे मैं क्या करूँगी ? श्रीमान् जो कुछ केवल अमृतत्वका साधन जानते हों, उस अमृतत्वके साधनका ही मुझे उपदेश करें ॥ ३ ॥

याज्ञवल्क्यजीका आश्वासन

स होवाच याज्ञवल्क्यः प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्स्व व्याख्यास्यामि ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥

उन याज्ञवल्क्यजीने कहा, 'धन्य ! अरी मैत्रेयी, तू पहले भी हमारी प्रिया रही है और इस समय भी प्रिय लगनेवाली ही बात कह रही है। अच्छा आ, बैठ जा, मैं तेरे प्रति उसकी व्याख्या करूँगा, तू व्याख्यान किये हुए मेरे वाक्योंके अर्थका चिन्तन करना' ॥ ४ ॥

स होवाच याज्ञवल्क्यः । एवं वित्तसाध्येऽमृतत्वसाधने प्रत्याख्याते, याज्ञवल्क्यः स्वाभिप्रायसम्पत्तौ तुष्ट आह; स होवाच—प्रियेष्टा, बतेत्यनुकम्प्याह, अरे मैत्रेयि नोऽस्माकं पूर्वमपि प्रिया सती भवन्ती इदानीं प्रियमेव चित्तानुकूलं भाषसे; अत एह्यास्स्वोपविश व्याख्यास्यामि—यत्ते तव इष्टम् अमृतत्वसाधनम् आत्मज्ञानं कथयिष्यामि। व्याचक्षाण-उन याज्ञवल्क्यजीने कहा। इस प्रकार धनसे निष्पन्न होनेवाले अमृतत्वके साधनका त्याग कर दिये जानेपर याज्ञवल्क्यने अपने अभिप्रायकी पूर्तिसे संतुष्ट होकर कहा। वे बोले—बत अर्थात् उन्होंने अनुकम्पा करते हुए कहा—अरी मैत्रेयी ! तू हमारी प्रिया–इष्टा है अर्थात् पहलेहीसे हमारी प्रिया होकर इस समय भी तू प्रिय यानी अनुकूल ही भाषण कर रही है; इसलिये आ, बैठ जा, मैं तेरे अभीष्ट अमृतत्वके साधनभूत आत्मज्ञानकी व्याख्या अर्थात् उपदेश