भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 564
५५६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| तथा स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य शब्देन संयोज्यमानस्य आपूर्यमाणस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयादित्येवमादि पूर्ववत् । ८ । | तथा वह [दूसरा दृष्टान्त] ऐसा है—जिस प्रकार बजाये जाते हुए शब्दसे संयुक्त किये जाते हुए अर्थात् फूँके जाते हुए शङ्खके बाह्य शब्दोंको कोई ग्रहण नहीं कर सकता इत्यादि पूर्ववत् ऐसा ही अर्थ है ॥ ८ ॥ |


स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद्ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥

वह [तीसरा दृष्टान्त] ऐसा है—जैसे कोई बजायी जाती हुई वीणाके बाह्य शब्दोंको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होता; किंतु वीणा या वीणाके स्वरका ग्रहण होनेपर उस शब्दका भी ग्रहण हो जाता है ॥ ९ ॥

| तथा वीणायै वाद्यमानायै—<br>वीणाया वाद्यमानायाः। अनेकदृष्टान्तोपादानमिह सामान्यबहुत्वख्यापनार्थम्—अनेके हि विलक्षणाश्चेतनाचेतनरूपाः सामान्यविशेषाः—तेषां पारम्पर्यगत्या यथैकस्मिन्महासामान्येऽन्तर्भावः प्रज्ञानघने, कथं नाम प्रदर्शयितव्य इति; दुन्दुभिशङ्खवीणाशब्दसामान्यविशेषाणां यथा | इसी प्रकार 'वीणायै वाद्यमानायै'<br>अर्थात् बजायी जाती हुई वीणाका इत्यादि समझना चाहिये। यहाँ अनेक दृष्टान्तोंका ग्रहण सामान्योंकी बहुलता प्रकट करनेके लिये है। चेतन और अचेतन, सामान्य एवं विशेष अनेक और विलक्षण हैं। उनका जिस प्रकार परम्परा गतिसे एक प्रज्ञानघन महासामान्यमें अन्तर्भाव है—यही किसी-न-किसी तरह दिखलाना है। जिस प्रकार दुन्दुभि, शङ्ख और वीणाके सामान्य एवं विशेष |