भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 573, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 573

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५६५


संस्कृतहिन्दी
त्मविशेषप्रकाशकत्वेन संस्थानान्तराणि करणानि प्रदीपवत् । तस्मान्न करणानां पृथक्प्रलये यत्नः कार्यः, विषयसामान्यात्मकत्वाद्विषयप्रलयेनैव प्रलयः सिद्धो भवति करणानामिति ।। ११ ।।विषयविशेषोंके स्वरूपविशेषके प्रकाशकरूपसे इन्द्रियाँ उन्हींके अन्य संस्थानमात्र हैं । इसलिये इन्द्रियोंके प्रलयके लिये पृथक् प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है, विषयसामान्य रूप होनेके कारण विषयके प्रलयसे ही इन्द्रियोंका भी प्रलय सिद्ध हो जाता है ॥ ११ ॥

विवेकद्वारा देहादिके विज्ञानघनस्वरूप होनेमें जलमें डाले हुए लवणखण्डका दृष्टान्त

संस्कृतहिन्दी
तत्र 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (२ । ४ । ६) इति प्रतिज्ञातम्, तत्र हेतुरभिहितः—आत्मसामान्यत्वम्, आत्मजत्वम्, आत्मप्रलयत्वं च । तस्मादुत्पत्तिस्थितिप्रलयकालेषु प्रज्ञानव्यतिरेकेणाभावात् “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५ । ३) “आत्मैवेदं सर्वम्” (छा० उ० ७ । २५ । २) इति प्रतिज्ञातं यत्, तत्तर्कतः साधितम् । स्वाभाविकोऽयं प्रलय इति पौराणिका वदन्ति । यस्तु बुद्धिपूर्वकः प्रलयो ब्रह्मविदां ब्रह्मविद्यानिमित्तः, अयमात्यन्तिक इत्याचक्षते—अविद्यानिरोधद्वारेण यो भवति; तदर्थोऽयं विशेषारम्भः—तहाँ यह प्रतिज्ञा की गयी है कि 'यह जो कुछ है सब आत्मा है ।' इसमें आत्मसामान्यत्व, आत्मजनितत्व और आत्मप्रलयत्व ये हेतु बतलाये हैं । अतः उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयकालोंमें प्रज्ञानसे भिन्न किसीकी सत्ता न होनेके कारण जो ऐसी प्रतिज्ञा की थी कि “प्रज्ञान ब्रह्म है” “यह सब आत्मा ही है” उसे तर्कसे भी सिद्ध कर दिया । यह प्रलय स्वाभाविक है—ऐसा पौराणिक लोग कहते हैं । ब्रह्मवेत्ताओंका जो ब्रह्मविद्याजनित बुद्धिपूर्वक प्रलय होता है, वह आत्यन्तिक है—ऐसा कहते हैं, जो कि अविद्याके निरोधद्वारा होता है; उसीके लिये यह विशेष आरम्भ किया जाता है ।

१. कार्यका कारणके आश्रित रहना—यही इसकी स्वाभाविकता है ।

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