भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 580, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 580
५७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

मैत्रेयीकी शङ्का और याज्ञवल्क्यका समाधान

एवं प्रतिबोधिता—इस प्रकार बोध कराये जानेपर—

सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्तीति स होवाच न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥

उस मैत्रेयीने कहा, 'शरीरपातके अनन्तर कोई संज्ञा नहीं रहती—ऐसा कहकर ही श्रीमान्ने मुझे मोहमें डाल दिया है।' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ, अरी ! यह तो उस (महद्भूत) का विज्ञान करानेके लिये पर्याप्त है' ॥ १३ ॥

सा ह किलोवाचोक्तवती मैत्रेयी—अत्रैव एतस्मिन्नेव एकस्मिन्वस्तुनि ब्रह्मणि विरुद्धधर्मवत्त्वमाचक्षाणेन भगवता मम मोहः कृतः; तदाह—अत्रैव मा भगवान्पूजावानमूमुहन्मोहं कृतवान्। कथं तेन विरुद्धधर्मवत्त्वम् उक्तमित्युच्यते—पूर्वं विज्ञानघन एवेति प्रतिज्ञाय पुनर्न प्रेत्य संज्ञास्तीति; कथं विज्ञानघन एव ? कथं वा न प्रेत्य संज्ञा-उस मैत्रेयीने कहा, यही—इस एक वस्तु ब्रह्ममें ही विरुद्ध धर्मवत्ताका वर्णन करनेवाले श्रीमान्ने तो मुझे मोह उत्पन्न कर दिया है। इसी बातको श्रुति कहती है—इस (ब्रह्मके) विषयमें ही मुझे आप भगवान्—पूजावान् अर्थात् पूज्य पुरुषने अमूमुहत्—मोह उत्पन्न कर दिया। उन्होंने ब्रह्मकी विरुद्धधर्मवत्ताका किस प्रकार वर्णन किया है—सो बतलाया जाता है—पहले 'वह विज्ञानघन ही है' ऐसी प्रतिज्ञा करके फिर 'देहपातके अनन्तर कोई संज्ञा नहीं रहती' ऐसा कहा है। सो किस प्रकार वह विज्ञानघन ही है और किस प्रकार देहपातके अनन्तर उसकी कोई संज्ञा नहीं रहती ? एक