बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 581, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७३
| संस्कृत-मूल / भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| स्त्वतीति ? न ह्युष्णः शीतश्चाग्नि-रेवैको भवति। अतो मूढास्म्यत्र। | ही अग्नि उष्ण और शीतल दोनों प्रकारका नहीं हो सकता; अतः इस विषयमें मुझे मोह (भ्रम) हो गया है। |
| स होवाच याज्ञवल्क्यः—न वा अरे मैत्रेयहं मोहं ब्रवीमि—मोहनं वाक्यं न ब्रवीमीत्यर्थः। ननु कथं विरुद्धधर्मत्वमवोचः—विज्ञानघनं संज्ञाभावं च ? न मयेदमेकस्मिन्धर्मिण्यभिहितम्, त्वयैवेदं विरुद्धधर्मत्वेनैकं वस्तु परिगृहीतं भ्रान्त्या, न तु मयोक्तम्। मया त्विदमुक्तम्—यस्त्वविद्याप्रत्युपस्थापितः कार्यकारणसम्बन्धी आत्मनः खिल्यभावः, तस्मिन्विद्यया नाशिते, तन्निमित्ता या विशेषसंज्ञा शरीरादिसम्बन्धिनी अन्यत्वदर्शनलक्षणा, सा कार्यकारणसङ्घातोपाधौ प्रविलापिते नश्यति हेत्वभावाद् उदकाधारनाशादिव चन्द्रादिप्रतिबिम्ब- | उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'हे मैत्रेयि ! मैं मोहका उपदेश नहीं कर रहा हूँ अर्थात् मोह उत्पन्न करनेवाली बात नहीं कह रहा हूँ।' [मैत्रेयी बोली] तो फिर 'वह विज्ञानघन है और उसकी कोई संज्ञा नहीं है, ये आपने उसके दो विरुद्ध धर्म क्यों बतलाये ? [याज्ञवल्क्यने कहा—] मैंने ये धर्म एक ही धर्मीमें नहीं बतलाये हैं; भ्रान्तिसे तूने ही एक वस्तुको विरुद्ध धर्मवाली समझ लिया है, मैंने ऐसा नहीं कहा। मैंने तो ऐसा कहा था कि आत्माका जो अविद्याद्वारा प्रस्तुत किया हुआ देहेन्द्रियसम्बन्धी खिल्यभाव है, उसका विद्याद्वारा नाश कर दिये जानेपर उस खिल्यभावके कारण पड़ी हुई जो शरीरादिसम्बन्धिनी अन्यत्वदर्शनरूपा विशेष संज्ञा होती है, वह कार्यकारणसंघातरूप उपाधिके लीन कर देनेपर कोई हेतु न रहनेके कारण इसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार जलादि आधारका नाश हो जानेपर चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब और |