बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 619, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 619
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६११ |
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| संस्कृत | हिन्दी |
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| पुरश्चक्रे, पुरः पुराणि शरीराणि, यत इयमव्याकृतव्याकरणप्रक्रिया—स परमेश्वरो नामरूपे अव्याकृते व्याकुर्वाणः प्रथमं भूरादीँल्लोकान् सृष्ट्वा चक्रे कृतवान्, द्विपदो द्विपादुपलक्षितानि मनुष्यशरीराणि पक्षिशरीराणि । तथा पुरः शरीराणि चक्रे चतुष्पदश्चतुष्पादुपलक्षितानि पशुशरीराणि । | 'पुरश्चक्रे'—पुर अर्थात् शरीर; क्योंकि यह अव्यक्तके व्यक्त होनेकी प्रक्रिया है। उसपरमेश्वरने अव्यक्त नामरूपको व्यक्त करते हुए पहले भूः आदि लोकोंकी रचना कर द्विपदोंको—दो पैरोंसे उपलक्षित मनुष्य-शरीर और पक्षिशरीरोंको 'चक्रे'—रचा। तथा चतुष्पद—चार पैरोंसे उपलक्षित पशुशरीरोंको बनाया। |
| पुरः पुरस्तात्, स ईश्वरः पक्षी लिङ्गशरीरं भूत्वा पुरः शरीराणि—पुरुष आविशदित्यस्यार्थमाचष्टे श्रुतिः—स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु सर्वशरीरेषु पुरिशयः, पुरि शेत इति पुरिशयः सन् पुरुष इत्युच्यते । नैनेनानेन किञ्चन किञ्चिदप्यनावृतमनाच्छादितम् । तथा नैनेन किञ्चनासंवृतमन्तरननुप्रवेशितं बाह्यभूतेनान्तर्भूतेन च न अनावृतम् । एवं स एव नामरूपात्मना अन्तर्बहिर्भावेन कार्यकारणरूपेण व्यवस्थितः । पुरश्चक्रे इत्यादिमन्त्रः सङ्क्षेपत आत्मैकत्वमाचष्ट इत्यर्थः ॥१८॥ | पुरः अर्थात् पहले वह ईश्वर पक्षी—लिङ्गशरीर होकर पुरू—शरीरोंमें पुरुषरूपसे प्रविष्ट हो गया—इसी वाक्यका अर्थ श्रुति करती है—वही यह पुरुष समस्त पुरों—सम्पूर्ण शरीरोंमें पुरिशय है, पुरमें शयन करता है, अतः पुरिशय होनेके कारण वह 'पुरुष' इस प्रकार कहा जाता है। इससे कुछ भी अनावृत—अनाच्छादित नहीं है। तथा इससे कुछ भी असंवृत नहीं है, अर्थात् ऐसा कुछ भी नहीं है, जहाँ पुरुष भीतर और बाहर रहकर स्वयं प्रविष्ट—व्याप्त न हो। इस प्रकार वही नामरूपात्मक अन्तर्बाह्यभावसे देह और इन्द्रियरूपमें स्थित है। तात्पर्य यह है कि यह 'पुरश्चक्रे' इत्यादि मन्त्र संक्षेपसे आत्माके एकत्वका निरूपण करता है ॥१८॥ |