भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 715, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 715

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०५


(४। ३। ७) 'न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते" (४। ३। २३) इति च।हुआ” तथा “द्रष्टाकी दृष्टिका विपरिलोप नहीं होता” इत्यादि।
तमिममर्थमाह—लौकिक्या दृष्टेः कर्मभूतायाः, द्रष्टारं स्वकीयया नित्यया दृष्ट्या व्याप्तारम्, न पश्येः; यासौ लौकिकी दृष्टिः कर्मभूता, सा रूपोपरक्ता रूपाभिव्यञ्जिका नात्मानं स्वात्मनो व्याप्तारं प्रत्यञ्चं व्याप्नोति; तस्मात्तं प्रत्यगात्मानं दृष्टेर्द्रष्टारं न पश्येः। तथा श्रुतेः श्रोतारं न शृणुयाः, तथा मतेर्मनोवृत्तेः केवलाया व्याप्तारं न मन्वीथाः। तथा विज्ञातेः केवलाया बुद्धिवृत्तेर्व्याप्तारं न विजानीयाः। एष वस्तुनः स्वभावः; अतो नैव दर्शयितुं शक्यते गवादिवत्।उसी बातको याज्ञवल्क्य इस प्रकार कहता है—जो अपनी कर्मभूता लौकिकी दृष्टिका द्रष्टा और उसे अपनी नित्यदृष्टिसे व्याप्त करनेवाला है, उसे तुम नहीं देख सकते। यह जो उसकी कर्मभूता लौकिकी दृष्टि है, वह रूपसे उपरक्त होकर रूपकी अभिव्यञ्जिका है, वह अपनेको व्याप्त करनेवाले प्रत्यगात्माको व्याप्त नहीं कर सकती; अतः उस दृष्टिके द्रष्टा प्रत्यगात्माको नहीं देख सकते। इसी प्रकार उस श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते तथा मति—केवल मनोवृत्तिके व्याप्त करनेवालेका मनन नहीं कर सकते। एवं विज्ञाति—केवल बुद्धिवृत्तिके व्याप्त करनेवालेको नहीं जान सकते। यह [उस] वस्तुका स्वभाव है, इसलिये उसे गो आदिके समान दिखाया नहीं जा सकता।
'न दृष्टेर्द्रष्टारम्' इत्यत्राक्षराणयन्यथा व्याचक्षते केचित्—न दृष्टेर्द्रष्टारं दृष्टेः कर्तारं दृष्टिभेदमकृत्वा दृष्टिमात्रस्य कर्तारम्, न पश्येरिति;कोई-कोई [भर्तृप्रपञ्चादि] 'न दृष्टेर्द्रष्टारम्' इत्यादि श्रुतिके अक्षरोंकी दूसरी तरह व्याख्या करते हैं। दृष्टिके द्रष्टा अर्थात् दृष्टिके कर्ताको नहीं देख सकते यानी दृष्टिभेद बिना किये तुम केवल दृष्टिमात्रके कर्ताको नहीं देख सकते; यहाँ

बृ० उ० ४५—