बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 719, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७०९
| एष ते तवात्मा सर्वैरुक्तैर्विशेषणैर्विशिष्टः, अत एतस्मादात्मनोऽन्यदार्तम्—कार्यं वा शरीरम्; करणात्मकं वा लिङ्गम्; एतदेवैकमनार्तमविनाशि कूटस्थम्; ततो ह उषस्तश्चाक्रायण उपरराम ॥ २ ॥ | तुम्हारा यह आत्मा उपर्युक्त समस्त विशेषणोंसे विशिष्ट है; इसलिये इस आत्मासे भिन्न और सब कार्यभूत शरीर अथवा करणात्मक लिङ्ग देह आर्त (नाशवान्) है, एक यही अनार्त-अविनाशी अर्थात् कूटस्थ है; तब चाक्रायण उषस्त चुप हो गया ॥ २ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये तृतीयाध्याये चतुर्थमुषस्तब्राह्मणम् ॥ ४ ॥
पञ्चम ब्राह्मण
याज्ञवल्क्य-कहोल-संवाद
| बन्धनं सप्रयोजकमुक्तम्, यश्च बद्धस्तस्याप्यस्तित्वमधिगतम्, व्यतिरिक्तत्वं च । तस्येदानीं बन्धमोक्षसाधनं ससंन्यासमात्मज्ञानं वक्तव्यमिति कहोलप्रश्न आरभ्यते— | प्रयोजकोंके सहित बन्धनका वर्णन किया गया और जो बद्ध है उसका अस्तित्व तथा [ देहेन्द्रिय-संघातसे ] भिन्नत्व भी विदित हुआ । अब उसके बन्धनसे मुक्त होनेके साधनरूप संन्याससहित आत्मज्ञानका प्रतिपादन करना है, इसलिये कहोलका प्रश्न आरम्भ किया जाता है— |
संन्याससहित आत्मज्ञानका निरूपण
अथ हैनं कहोलः कौषीतकेयः पप्रच्छ याज्ञवल्क्येति होवाच यदेव साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरस्तं मे