बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 731, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 731
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ७२१ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| वित्तैषणा, दृष्टफलसाधनत्वतुल्यत्वात्; या वित्तैषणा सा लोकैषणा; फलार्थैव सा; सर्वः फलार्थप्रयुक्त एव हि सर्वं साधनमुपादत्ते; अत एकैव एषणा, या लोकैषणा सा साधनमन्तरेण सम्पादयितुं न शक्यत इति, साध्यसाधनभेदेन उभे हि यस्मादेते एषणे एव भवतः; तस्माद् ब्रह्मविदो नास्ति कर्म कर्मसाधनं वा।<br><br>अतो येऽतिक्रान्ता ब्राह्मणाः<br><br>[भिक्षाचर्यविधानम्]<br>सर्वं कर्म कर्मसाधनं च सर्वं देवपितृमानुषनिमित्तं यज्ञोपवीतादि; तेन हि दैवं पित्र्यं मानुषं च कर्म क्रियते, “निवीतं मनुष्याणाम्” इत्यादिश्रुतेः। तस्मात् पूर्वे ब्राह्मणा ब्रह्मविदो व्युत्थाय कर्मभ्यः कर्मसाधनेभ्यश्च यज्ञोपवीतादिभ्यः, परमहंसपारिव्राज्यं प्रतिपद्य, भिक्षाचर्यं चरन्ति | उनका दृष्ट फलमें साधन होना समान है; और जो वित्तैषणा है वही लोकैषणा है, क्योंकि वह फलके ही लिये है; सब लोग फलरूप प्रयोजनसे प्रेरित होकर ही सारे साधनोंको स्वीकार करते हैं; अतः एक ही एषणा है; जो लोकैषणा है, उसका साधनके बिना सम्पादन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इस प्रकार साध्य-साधन-भेदसे ये दोनों एषणाएं ही हैं; अतः ब्रह्मवेत्ताके लिये कर्म और कर्मका साधन दोनों ही नहीं हैं।<br><br>अतः जो पूर्ववर्ती ब्राह्मण थे, वे सम्पूर्ण कर्म और देव, पितृ एवं मनुष्यलोकसम्बन्धी यज्ञोपवीतादि सम्पूर्ण कर्मसाधनोंको [छोड़कर], क्योंकि उन्हींसे देव, पितृ और मनुष्यलोकसम्बन्धी कर्म किये जाते हैं, जैसा कि “मनुष्योंके लिये निवीत¹ [पितरोंके लिये प्राचीनावीत² और देवोंके लिये उपवीत³ है]” इस श्रुतिसे ज्ञात होता है। अतः पूर्ववर्ती ब्राह्मण—ब्रह्मवेत्तालोग कर्म और कर्मके साधन यज्ञोपवीतादिसे व्युत्थान कर परमहंस परिव्राजकभावको प्राप्त होकर भिक्षाचर्या करते हैं। |
१. जनेऊको मालाकी भाँति पहनना। २. जनेऊको अपसव्यभावसे अर्थात् दायें कन्धेपर पहनना। ३. जनेऊको सव्यभावसे यानी बायें कन्धेपर पहनना।
बृ० उ० ४६—