भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 763, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 763

ब्राह्मण ७ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५३


शरीर हैं और जो भातर रहकर चन्द्रमा और ताराओंका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ ११ ॥ जो आकाशमें रहनेवाला आकाशके भीतर है, जिसे आकाश नहीं जानता, आकाश जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर आकाशका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १२ ॥ जो तममें रहनेवाला तमके भीतर है, जिसे तम नहीं जानता, तम जिसका शरीर है और जो भोतर रहकर तमका नियमन करता है वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है ॥ १३ ॥ जो तेजमें रहनेवाला तेजके भीतर है, जिसे तेज नहीं जानता, तेज जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर तेजका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है, यह अधिदैवत-दर्शन हुआ, आगे अधिभूत-दर्शन है ॥ १४ ॥

| समानमन्यत्। योऽप्सु तिष्ठन्—<br>अग्नौ, अन्तरिक्षे, वायौ, दिवि,<br>आदित्ये, दिक्षु, चन्द्रतारके,<br>आकाशे, यस्तमस्यावरणात्मके<br>बाह्ये तमसि, तेजसि तद्विपरीते<br>प्रकाशसामान्ये इत्येवमधिदैवतम्<br>अन्तर्यामिविषयं दर्शनं देवतासु।<br>अथाधिभूतं भूतेषु ब्रह्मादिस्त-<br>म्बपर्यन्तेषु अन्तर्यामिदर्शन-<br>मधिभूतम् ॥ ४-१४ ॥ | शेष सब तृतीय मन्त्रके समान ही<br>है। जो जलमें, अग्निमें, अन्तरिक्षमें,<br>वायुमें, द्युलोकमें, आदित्यमें,<br>दिशाओंमें, चन्द्रमा एवं ताराओंमें<br>और आकाशमें रहनेवाला है; जो<br>तम अर्थात् आवरणात्मक बाह्य<br>तममें, तेज अर्थात् तमसे विपरीत<br>सामान्य प्रकाशमें रहनेवाला है;<br>इस प्रकार यह अन्तर्यामिविषयक<br>अधिदैवत—देवतान्तर्गत दर्शन है,<br>इससे आगे अधिभूत-दर्शन है,<br>ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त<br>भूतोंमें जो अन्तर्यामिदर्शन है, वह<br>अधिभूत-दर्शन है ॥ ४-१४ ॥ |


यः सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन् सर्वेभ्यो भूतेभ्योऽन्तरो यं सर्वाणि भूतानि न विदुर्यस्य सर्वाणि भूतानि शरीरं यः

बृ० उ० ४८—

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