भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 817, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 817

ब्राह्मण ९] शाङ्करभाष्यार्थ ८०७


'इस पूर्वदिशामें तुम किस देवतासे युक्त हो?' [ याज्ञवल्क्य— 'वहाँ मैं आदित्य (सूर्य) देवतावाला हूँ।' [शाकल्य-] 'वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है?' [याज्ञवल्क्य-] 'नेत्रमें।' [शाकल्य-] 'नेत्र किसमें प्रतिष्ठित है? [याज्ञवल्क्य-] 'रूपोंमें, क्योंकि पुरुष नेत्रसे ही रूपोंको देखता है।' [शाकल्य-] 'रूप किसमें प्रतिष्ठित है?' याज्ञवल्क्यने कहा, 'हृदयमें, क्योंकि पुरुष हृदयसे ही रूपोंको जानता है, अतः हृदयमें ही रूप प्रतिष्ठित हैं।' [शाकल्य-] 'हे याज्ञवल्क्य! यह बात ऐसी ही है' ॥ २० ॥


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
किन्देवतः का देवतास्य तव दिग्भूतस्य । असौ हि याज्ञवल्क्यो हृदयमात्मानं दिक्षु पञ्चधा विभक्तं दिगात्मभूतम्, तद्द्वारेण सर्वं जगदात्मत्वेनोपगम्य, अहमस्मि दिगात्मेति व्यवस्थितः, पूर्वाभिमुखः—सप्रतिष्ठावचनाद्, यथा याज्ञवल्क्यस्य प्रतिज्ञा तथैव पृच्छति—किन्देवतस्त्वमस्यां दिश्यसीति ।तुम किस देवतावाले हो ? अर्थात् दिशास्वरूपमें स्थित हुए तुम्हारा कौन देवता है ? यहाँ इस प्रकार प्रश्न करनेका कारण यह है कि वे याज्ञवल्क्य दिशाओंमें पांच प्रकारसे विभक्त अपने हृदयोपाधिक आत्माको 'दिगात्म' स्वरूप समझकर और उसके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को आत्मभावसे जानकर 'मैं दिक्स्वरूप हूँ' इस प्रकार स्थित हैं; वह पूर्वाभिमुख है [ इसलिये पहले पूर्वदिशाके विषयमें ही पूछा जाता है ] तथा उसका कथन है कि प्रतिष्ठासहित दिशाओंको जानता हूँ, [इससे यह जान पड़ता है कि वह समस्त जगत्को आत्मरूप जानकर स्थित है।] इसलिये जैसी याज्ञवल्क्यकी प्रतिज्ञा है, वैसे ही शाकल्य पूछता है—'तुम इस पूर्वदिशामें कौन-से देवतावाले हो ?'
सर्वत्र हि वेदे यां यां देवतामुपास्ते, इहैव तद्भूतस्तां तां प्रति-वेदमें सभी जगह पुरुष जिस-जिस देवताकी उपासना करता है, इस लोकमें तद्रूप हुआ ही वह