बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 818, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ८०८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| पद्यत इति; तथा च वक्ष्यति— “देवो भूत्वा देवानप्येति” (बृ० उ० ४ । १ । २) इति। अस्यां प्राच्यां का देवता दिगात्मनस्तवाधिष्ठात्री, कया देवतया त्वं प्राचीदिग्रूपेण सम्पन्न इत्यर्थः। <br><br> इतर आह—आदित्यदेवत इति। प्राच्यां दिशि मम आदित्यो देवता, सोऽहमादित्यदेवतः। सदेवा इत्येतदुक्तम्, सप्रतिष्ठा इति तु वक्तव्यमित्याह— स आदित्यः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति ? चक्षुषीति। अध्यात्मतश्चक्षुष आदित्यो निष्पन्न इति हि मन्त्रब्राह्मणवादाः— “चक्षोः सूर्यो अजायत” (यजु० ३१ । १२) “चक्षुष आदित्यः” (ऐ० उ० १ । ४) इत्यादयः। कार्यं हि कारणे प्रतिष्ठितं भवति। <br><br> कस्मिन्नु चक्षुः प्रतिष्ठितमिति ? रूपेष्विति; रूपग्रहणाय हि रूपात्मकं चक्षू रूपेण प्रयुक्तम्; यैर्हि | उस-उस देवताको प्राप्त होता है। ऐसा ही “देव होकर देवोंमें लीन होता है” यह श्रुति कहेगी। [अतः प्रश्न यह है कि] दिशारूपमें स्थित हुए तुम्हारा इस पूर्व दिशामें कौन अधिष्ठाता देवता है ? अर्थात् किस देवताके द्वारा तुम प्राची दिशाके रूपमें सम्पन्न हुए हो ? <br><br> इतर (याज्ञवल्क्य) ने कहा, ‘[प्राची दिशामें] मैं आदित्यदेवतावाला हूँ। अर्थात् पूर्वदिशामें आदित्य मेरा देवता है, इसलिये मैं आदित्यदेवतावाला हूँ।’ इस प्रकार देवतासहित प्राची दिशा तो कह दी, अब प्रतिष्ठासहित कहनी है, इसलिये शाकल्य कहता है-‘वह आदित्य किसमें प्रतिष्ठित है?’ [याज्ञवल्क्य-] ‘चक्षुमें’। अध्यात्म चक्षुसे आदित्य निष्पन्न हुआ है—ऐसा “चक्षुसे सूर्य उत्पन्न हुआ” “चक्षुसे आदित्य” इत्यादि मन्त्र और ब्राह्मण कहते हैं। और कार्य कारणमें ही प्रतिष्ठित होता है; [अतः आदित्य चक्षुमें प्रतिष्ठित है]। <br><br> ‘चक्षु किसमें प्रतिष्ठित है?’ ‘रूपोंमें’; क्योंकि रूपात्मक चक्षु रूपको ग्रहण करनेके लिये ही रूपसे प्रेरित होता है; और जिन रूपों- |