भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 87

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ८१


मृत्यु॑रस्यात्मा भवत्येतासां॑ देवतानामेको॑ भवति ॥७॥

उसने कामना की मेरा यह शरीर मेध्य (यज्ञिय) हो, मैं इसके द्वारा शरीरवान् होऊँ; क्योंकि वह शरीर अश्वत् अर्थात् फूल गया था, इसलिये वह अश्व हो गया और वह मेध्य हुआ। अतः यही अश्वमेधका अश्वमेधत्व है। जो इसे इस प्रकार जानता है वही अश्वमेधको जानता है। उसने उसे अवरोधरहित (बन्धनशून्य) ही चिन्तन किया। उसने संवत्सरके पश्चात् उसका अपने ही लिये [अर्थात् इसका देवता प्रजापति है—ऐसे भावसे] आलभन किया तथा अन्य पशुओंको भी देवताओंके प्रति पहुँचाया। अतः याज्ञिकलोग मन्त्रद्वारा संस्कार किये हुए सर्व-देवसम्बन्धी प्राजापत्य पशुका आलभन करते हैं। यह जो [सूर्य] तपता है वही अश्वमेध है। उसका संवत्सर शरीर है, यह अग्नि अर्क है तथा उसके ये लोक आत्मा हैं। ये ही दोनों (अग्नि और आदित्य) अर्क और अश्वमेध हैं। किंतु वे मृत्युरूप एक ही देवता हैं। जो इस प्रकार जानता है वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है, उसे मृत्यु नहीं पा सकता, मृत्यु उसका आत्मा हो जाता है तथा वह इन देवताओंमेंसे ही एक हो जाता है ॥७॥

| सोऽकामयत, कथम् ? मेध्यं मेधाहं यज्ञियं मे ममेदं शरीरं स्यात् । किञ्च आत्मन्व्यात्मवांश्चानेन शरीरेण शरीरवान्स्यामिति प्रविवेश । यस्मात्तच्छरीरं तद्वियोगाद्गतयशोवीर्यं सद् अश्वद् अश्वयत् ततस्तस्मादश्वः समभवत् । ततोऽश्वनामा प्रजापतिरेव साक्षादिति | उसने कामना की। किस प्रकार ?—मेरा यह शरीर मेध्य—यज्ञिय हो जाय। तथा मैं आत्मन्वी—आत्मवान् अर्थात् इस शरीरसे शरीरवान् हो जाऊँ। ऐसा विचारकर उसने उसमें प्रवेश किया। क्योंकि वह शरीर उसके वियोगसे यशोवीर्यहीन होकर अश्वत्—अश्वयत् अर्थात् फूल गया था, अतः उससे अश्व उत्पन्न हुआ। इसीसे अश्व नामका साक्षात् प्रजापति ही |

बृ० उ० ६—