भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 901, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 901

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ८८७


मूल संस्कृतभाष्यार्थ
यदुक्तम्—कार्यकरणसंघातसमानजातीयमेव ज्योतिरन्तरमनुमेयम्, आदित्यादिभिः तत्समानजातीयैरेव उपक्रियमाणत्वादिति—तदसत्, उपकार्योपकारकभावस्यानियमदर्शनात्; कथम् ? पार्थिवैरिन्धनैः पार्थिवत्वसमानजातीयैस्तृणोलपादिभिरग्नेः प्रज्वलनोपकारः क्रियमाणो दृश्यते; न च तावता तत्समानजातीयैरेवाग्नेः प्रज्वलनोपकारः सर्वत्रानुमेयः स्यात्, येनोदकेनापि प्रज्वलनोपकारो भिन्नजातीयेन वैद्युतस्याग्नेः जाठरस्य च क्रियमाणो दृश्यते; तस्माद् उपकार्योपकारकभावे समानजातीयासमानजातीयनियमो नास्ति; कदाचित् समानजातीया मनुष्या मनुष्यैरेवोपक्रियन्ते कदाचित् स्थावरपश्वादिभिश्च भिन्न-ऐसा जो कहा कि देहेन्द्रिय-संघातके समान जातिवाली ही किसी अन्य ज्योतिका अनुमान करना चाहिये, क्योंकि आदित्यादि तथा उसके समानजातीय ज्योतियोंसे ही संघातका उपकार होता है, सो भी ठीक नहीं है, क्योंकि उपकार्य-उपकारकभावका कोई नियम नहीं देखा जाता; किस प्रकार ? [ सो बतलाते हैं— ] पार्थिव इन्धनसे एवं पार्थिवत्वमें समान जातिवाले तृण और उलप ( घास ) आदिसे अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता देखा जाता है, किंतु इतनेहीसे सर्वत्र ऐसा अनुमान नहीं कर लेना चाहिये कि उनके समानजातीय पदार्थोंसे ही अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होगा, क्योंकि उनसे भिन्न जातिवाले जलसे भी बिजलीरूप अग्निका तथा पेटके भीतरकी अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता देखा जाता है; अतः उपकार्योपकारकभावमें समानजातीय अथवा असमानजातीय होनेका नियम नहीं है; कभी तो समानजातीय मनुष्य मनुष्योंसे ही उपकृत होते हैं और कभी स्थावर एवं पशु आदि भिन्न जातिवालोंसे ही