बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 939, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 939
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९२५ |
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| संस्कृत-शङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ (हिन्दी) |
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| कथं पुनस्तस्य परलोकस्थानस्यास्तित्वमवगम्यते ? यदपेक्ष्य स्वप्नस्थानं संध्यं भवेत्—यतस्तस्मिन् संध्ये स्वप्नस्थाने तिष्ठन् भवन् वर्तमानः एते उभे स्थाने पश्यति; के ते उभे ? इदं च परलोकस्थानं च । तस्मात् स्तः स्वप्नजागरितव्यतिरेकेणोभौ लोकौ, यौ धिया समानः सन्ननुसंचरति जन्ममरणसंतानप्रबन्धेन । | किंतु उस परलोकस्थानके अस्तित्वका ज्ञान कैसे होता है ? जिसकी अपेक्षासे स्वप्नस्थान संध्यस्थान होता है ? [ इसका उत्तर देते हैं ] क्योंकि उस संध्य स्वप्नस्थानमें स्थित अर्थात् वर्तमान रहकर पुरुष इन दोनों स्थानोंको देखता है; वे दोनों स्थान कौन-से हैं?—यह लोकरूप स्थान और परलोकस्थान । अतः स्वप्न और जागरितसे भिन्न दोनों लोक हैं ही, जिनमें कि अपनी बुद्धिकी समानताको प्राप्त होकर पुरुष जन्म-मरणपरम्पराके क्रमसे निरन्तर संचार करता रहता है । |
| (स्वप्नस्थपुरुषस्योभयस्थानावलोकनप्रकारः)<br>कथं पुनः स्वप्ने स्थितः सन्नुभौ लोकौ पश्यति किमाश्रयः, केन विधिना ? इत्युच्यते—<br>अथ कथं पश्यति ? इति शृणु—यथाक्रम आक्रामत्यनेनेत्याक्रमः—आश्रयोऽवष्टम्भ इत्यर्थः । यादृश आक्रमोऽस्य, सोऽयं यथाक्रमः; अयं पुरुषः परलोकस्थाने प्रतिपत्तव्ये निमित्ते, यथाक्रमो भवति यादृशेन परलोकप्रतिपत्तिसाधनेन विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञालक्षणेन युक्तो | किंतु पुरुष स्वप्नमें स्थित रहकर किस प्रकार, किस आश्रयमें रहकर और किस विधिसे दोनों लोकोंको देखता है ? सो बतलाया जाता है—अब वह किस प्रकार देखता है ? सो सुनो—'यथाक्रम,' जिससे जीव आक्रमण करता है, उसे आक्रम—आश्रय अर्थात् अवष्टम्भ ( आधार ) कहते हैं । इस जीवका जैसा आक्रम हो, उसके अनुसार यह 'यथाक्रम' कहलाता है; यह पुरुष अपने प्राप्त करने योग्य परलोकस्थानरूप निमित्तमें जैसे आक्रमवाला होता है अर्थात् विद्या, कर्म और पूर्वप्रज्ञारूप जिस प्रकारके परलोकप्राप्तिके साधनसे |