बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 943, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ ९२९
| विहन्तेत्युच्यते—स्वयं निर्माय निर्माणं कृत्वा वासनामयं स्वप्नदेहं मायामयमिव, निर्माणमपि तत्कर्मापेक्षत्वात् स्वयंकर्तृकमुच्यते—स्वेन आत्मीयेन, भासा मात्रोपादानलक्षणेन भासा दीप्त्या प्रकाशेन, सर्ववासनात्मकेन अन्तःकरणवृत्तिप्रकाशेनेत्यर्थः—सा हि तत्र विषयभूता सर्ववासनामयी प्रकाशते, सा तत्र स्वयं भा उच्यते—तेन स्वेन भासा विषयभूतेन, स्वेन च ज्योतिषा तद्विषयिणा विविक्तरूपेण अलुप्तदृक्स्वभावेन तद् भारूपं वासनात्मकं विषयीकुर्वन् प्रस्वपिति । यदेवं वर्तनम्, तत् प्रस्वपितीत्युच्यते । | इसका हनन करनेवाला कहा जाता है—तथा स्वयंनिर्माण कर—मायामयके समान वासनामय स्वप्नदेह रचकर [शयन करता है।] देहका निर्माण भी आत्माके कर्मोंकी अपेक्षासे है, इसलिये वह आत्मकर्तृक कहा गया है। स्वकीय यानी अपने भाससे—मात्रोपादानरूप भास—दीप्ति अर्थात् प्रकाशसे यानी सर्ववासनात्मक अन्तःकरणवृत्तिरूप प्रकाशसे, क्योंकि वह सर्ववासनामयी वृत्ति ही वहाँ विषयभूता होकर प्रकाशित होती है, उस अवस्थामें वह स्वयं भा (प्रकाश) कही जाती है। उस अपनी विषयभूता भासे तथा उसको विषय करनेवाली विशुद्धरूपा ^१अलुप्तदृक्स्वभावा आत्मज्योतिसे उस अपने वासनात्मक प्रकाशस्वरूपको विषय करता हुआ प्रस्वाप (शयन) करता है। इस प्रकार जो रहना है, वही 'प्रस्वपिति' ऐसा कहा जाता है। | | अत्रैतस्यामवस्थायाम् एतस्मिन् काले, अयं पुरुष आत्मा, स्वयमेव विविक्तज्योतिर्भवति—बाह्याध्यात्मिकभूतभौतिकसंसर्गरहितं ज्योतिर्भवति । | यहाँ—इस अवस्थामें—इस कालमें यह पुरुष अर्थात् आत्मा स्वयं ही विशुद्धज्योतिःस्वरूप होता है अर्थात् बाह्य आध्यात्मिक भूत एवं भौतिक संसर्गसे रहित ज्योति होता है। |
१. जिसके बोधस्वरूप या साक्षीस्वभावका कभी लोप नहीं हुआ है।
बृ० उ० ५६—