भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 947, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 947
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ९३३

| मात्रा तामपादाय, रथादिवासना-<br>रूपान्तःकरणवृत्तिस्तदुपलब्धि-<br>निमित्तेन कर्मणा चोद्यमाना<br>दृश्यत्वेन व्यवतिष्ठते; तदुच्यते—<br>स्वयं निर्मायेति; तदेवाह—<br>रथादीन् सृजत इति । | लोककी वासनाकी मात्रा है, उसे<br>लेकर रथादिकी वासनारूपा जो<br>अन्तःकरणकी वृत्ति है, वह उसकी<br>उपलब्धिके निमित्तभूत कर्मसे प्रेरित<br>होकर दृश्यरूपसे स्थित होती है।<br>उसीको 'स्वयं निर्माय' इस प्रकार<br>कहा है और उसीको 'रथादीन्<br>सृजते' इन शब्दोंसे कहा है। | | न तु तत्र, करणं वा करणानु-<br>ग्राहकाणि वा आदित्यादिज्यो-<br>तींषि, तदवभास्यां वा रथादयो<br>विषया विद्यन्ते; तद्वासनामात्रं<br>तु केवलं तदुपलब्धिकर्मनिमित्त-<br>चोदितोद्भूतान्तःकरणवृत्त्याश्रयं<br>दृश्यते । तद् यस्य ज्योतिषो<br>दृश्यतेऽलुप्तदृशः, तदात्म-<br>ज्योतिस्तत्र केवलमसिमिव कोशाद्<br>विविक्तम् । | उस अवस्थामें इन्द्रिय, इन्द्रियों-<br>के अनुग्राहक आदित्यादि प्रकाश<br>अथवा उनसे प्रकाश्य रथादि विषय<br>भी नहीं हैं, उनकी उपलब्धिके हेतु-<br>भूत जो कर्म हैं, उन कर्मरूप<br>निमित्तसे प्रेरित जो अन्तःकरणकी<br>उद्भूत वृत्ति है, उसके आश्रित<br>रहनेवाली केवल उनकी वासना-<br>मात्र तो देखी जाती है। वह जिस<br>नित्यज्ञानस्वरूप ज्योतिको दिखायी<br>देती है, वह आत्मज्योति इस<br>अवस्थामें म्यानसे निकाली हुई<br>तलवारके समान शुद्ध होती है। | | तथा न तत्रानन्दाः सुखवि-<br>शेषाः, मुदो हर्षाः पुत्रादिलाभ-<br>निमित्ताः, प्रमुदस्त एव प्रकर्षो-<br>पेताः; अथ चानन्दादीन् सृजते । | इसी प्रकार उस समय आनन्द-<br>सुखविशेष, मुद्-पुत्रादिकी प्राप्तिसे<br>होनेवाले हर्ष और प्रमुद्-प्रकर्षको<br>प्राप्त हुए वे हर्ष भी नहीं हैं; किंतु<br>यह आनन्दादिको रच लेता है। | | तथा न तत्र वेशान्ताः पल्वलाः,<br>पुष्करिण्यस्तडागाः, स्रवन्त्यो नद्यो | तथा उस अवस्थामें न वेशान्त-<br>पल्वल (छोटी तलैया), न पुष्करिणी<br>तडाग और न स्रवन्ती-नदियाँ ही |