भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 962, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 962

| ९४८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ४ | | :--- | :--- |

| निर्गमनम्, पुनः पूर्वगमनवैपरीत्येन यदागमनं स प्रतिन्यायः—यथागतं पुनरागच्छतीत्यर्थः । प्रतियोनि यथास्थानम्; स्वप्नस्थानाद्धि सुषुप्तं प्रतिपन्नः सन् यथास्थानमेव पुनरागच्छति—प्रतियोनि आद्रवति, स्वप्नायैव स्वप्नस्थानायैव । | पुनः पहले जानेके विपरीत-क्रमसे अर्थात् जाकर जो फिर उलटे लौट आना है, उसे प्रतिन्याय कहते हैं। अर्थात् जिस प्रकार गया था, उसी प्रकार उलटे वापस आ जाता है। प्रतियोनि—यथास्थान। स्वप्नस्थानसे ही सुषुप्तिको प्राप्त होकर वह यथास्थान फिर आ जाता है, अर्थात् वह प्रतियोनि (यथास्थान) स्वप्न यानी स्वप्नस्थानके लिये ही लौट आता है। | | ननु स्वप्ने न करोति पुण्यपापे तयोः फलमेव पश्यतीति कथमवगम्यते ? यथा जागरिते तथा करोत्येव स्वप्नेऽपि, तुल्यत्वाद् दर्शनस्य—इत्यत आह—स आत्मा, यत् किञ्चित् तत्र स्वप्ने पश्यति पुण्यपापफलम्, अनन्वागतोऽननूबद्धस्तेन दृष्टेन भवति, नैवानुबद्धो भवति । | किंतु यह कैसे जाना गया कि वह स्वप्नमें पाप-पुण्य करता नहीं, केवल उनके फलको ही देखता है ? जिस प्रकार जागरितमें वैसे ही स्वप्नमें भी वह कर्म करता ही है, क्योंकि इन दोनों अवस्थाओंका दर्शन समान रूपसे ही होता है; ऐसी शङ्का होनेपर श्रुति कहती है—वह आत्मा स्वप्नमें जो कुछ पुण्य-पापका फल देखता है, उस देखे हुए-से वह अनन्वागत—बिना बँधा हुआ ही रहता है अर्थात् वह उससे बँधता नहीं है। | | यदि हि स्वप्ने कृतमेव तेन स्यात्, तेनानुबध्येत; स्वप्नादुत्थितोऽपि समन्वागतः स्यात्; न च तल्लोके—स्वप्नकृतकर्मणाऽन्वागत- | यदि उसने स्वप्नमें वैसा किया ही होता तो वह उससे बँध जाता और स्वप्नसे उठनेपर भी उससे संश्लिष्ट रहता; किंतु लोकमें स्वप्नमें किये हुए कर्मसे संश्लेष होनेकी प्रसिद्धि |