भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 973, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 973

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९५९

सुषुप्ति आत्माका विश्रान्तिस्थान है, इसमें श्येनका दृष्टान्त

तद् यथास्मिन्नाकाशे श्येनो वा सुपर्णो वा विपरिपत्य श्रान्तः सꣳहत्य पक्षौ संलयायैव ध्रियत एवमेवायं पुरुष एतस्मा अन्ताय धावति यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति ॥ १६ ॥

जिस प्रकार इस आकाशमें श्येन (बाज) अथवा सुपर्ण (तेज उड़नेवाला बाज) सब ओर उड़कर थक जानेपर पंखोंको फैलाकर घोंसलेकी ओर ही उड़ता है, इसी प्रकार यह पुरुष इस स्थानकी ओर दौड़ता है, जहाँ सोनेपर यह किसी भोगकी इच्छा नहीं करता, और न कोई स्वप्न ही देखता है ॥ १६ ॥

| तद् यथा-अस्मिन्नाकाशे भौतिके श्येनो वा सुपर्णो वा, सुपर्णशब्देन क्षिप्रः श्येन उच्यते; यथा आकाशेऽस्मिन् विहृत्य विपरिपत्य श्रान्तो नानापरिपतनलक्षणेन कर्मणा परिखिन्नः; संहत्य पक्षौ सङ्गमय्य सम्प्रसार्य पक्षौ; सम्यग्लीयते अस्मिन्निति संलयो नीडः; नीडायैव ध्रियते स्वात्मनैव धार्यते स्वयमेव; यथायं दृष्टान्तः, एवमेवायं पुरुषः; एतस्मा एतस्मै अन्ताय धावति । अन्तशब्दवाच्यस्य विशेषणम्-यत्र यस्मिन्नन्ते सुप्तः, न कञ्चन न कञ्चिदपि; | जिस प्रकार इस भौतिक आकाशमें श्येन अथवा सुपर्ण—सुपर्ण शब्दसे वेगवान् श्येन कहा गया है, जिस प्रकार इस आकाशमें विहार कर-सब ओर उड़कर थक जानेपर कई बार उड़ान भरना-रूप कर्मसे खिन्न होकर पंखोंके संहत-सङ्गत अर्थात् फैलाकर संलय--जिसमें सम्यक् प्रकारसे लीन होता है, उस घोंसलेका नाम संलय है, उस घोंसलेके प्रति स्वयं ही अपनेको धारण करता है; जैसा यह दृष्टान्त है, इसी प्रकार यह पुरुष एतस्मै-इस स्थानके प्रति दौड़ता है। अन्त-शब्दवाच्य स्थानका विशेषण-जिस स्थानमें शयन करनेपर यह किसी |