भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 974, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 974
९६०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| कामं कामयते; तथा न कञ्चन स्वप्नं पश्यति। <br><br> 'न कञ्चन कामम्' इति स्वप्नबुद्धान्तयोरविशेषेण सर्वः कामः प्रतिषिध्यते, 'कञ्चन' इत्यविशेषिताभिधानात्; तथा 'न कञ्चन स्वप्नम्, इति—जागरितेऽपि यद् दर्शनम्, तदपि स्वप्नं मन्यते श्रुतिः, अत आह—न कञ्चन स्वप्नं पश्यतीति; तथा च श्रुत्यन्तरम्—"तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्नाः" (ऐ०उ० १।३।१२) इति। <br><br> यथा दृष्टान्ते पक्षिणः परिपतनजश्रमापनुत्तये स्वनीडोपसर्पणम्, एवं जाग्रत्स्वप्नयोः कार्यकारणसंयोगजक्रियाफलैः संयुज्यमानस्य, पक्षिणः परिपतनज इव, श्रमो भवति; तच्छ्रमापनुत्तये स्वात्मनो नीडमायतनं सर्वसंसारधर्मविलक्षणं सर्वक्रियाकारक- | भोगकी इच्छा नहीं करता और इसी प्रकार न किसी स्वप्नको ही देखता है। <br><br> 'न कञ्चन कामम्' इससे स्वप्न और जागरितके सभी भोगोंका समानरूपसे प्रतिषेध किया जाता है, क्योंकि 'कञ्चन' (किसी भी) इस पदके द्वारा किसी भोगविशेषका नाम न लेकर समानरूपसे ही कहा गया है। इसी प्रकार 'न कञ्चन स्वप्नम्' इस वाक्यसे भी समझना चाहिये; जागरितमें भी जो कुछ देखा जाता है, उसे भी श्रुति स्वप्न ही मानती है, इसीसे कहती है कि कोई स्वप्न नहीं देखता; ऐसी ही एक अन्य श्रुति भी है—"उसके तीन आवसथ (स्थान) हैं और तीन स्वप्न हैं" इत्यादि। <br><br> जिस प्रकार दृष्टान्तमें उड़ानसे उत्पन्न हुए श्रमकी निवृत्तिके लिये पक्षीका अपने घोंसलेमें जाना दिखाया है, इसी प्रकार जाग्रत् और स्वप्न-अवस्थाओंमें देहेन्द्रियके संयोगसे होनेवाले क्रियाफलोंसे संयुक्त हुए जीवको, पक्षीके उड़नेसे होनेवाले श्रमके समान ही, श्रम होता है; उस श्रमकी निवृत्तिके लिये वह अपने घोंसले-निवासस्थान अर्थात् सम्पूर्ण संसारधर्मोंसे विलक्षण तथा सब प्रकार- |