बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 989, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 989
| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७५ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्य) | हिन्दी भाष्यार्थ |
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| क्तम्, असङ्गत्वादात्मनः, आगन्तुकत्वाच्च तेषाम्। तत्रैवमाशङ्का जायते; चैतन्यस्वभावत्वे सत्यप्येकीभावान्न जानाति स्त्रीपुंसयोरिव सम्परिष्वक्तयोरित्युक्तम्, तत्र प्रासङ्गिकमेतदुक्तम्—कामकर्मादिवत् स्वयंज्योतिष्ट्वमप्यस्यात्मनो न स्वभावः, यस्मात् सम्प्रसादे नोपलभ्यते—इत्याशङ्कायां प्राप्तायां तन्निराकरणाय स्त्रीपुंसयोः दृष्टान्तोपादानेन विद्यमानस्यैव स्वयंज्योतिष्ट्वस्य सुषुप्तेऽग्रहणमेकीभावाद्धेतोः, न तु कामकर्मादिवदागन्तुकम्। | चुका है, क्योंकि आत्मा असङ्ग है और वे (अविद्यादि) आगन्तुक हैं। इससे यह आशङ्का होती है—ऊपर यह कहा गया है कि चैतन्यस्वभाव होनेपर भी परस्पर आलिङ्गित स्त्री और पुरुषोंके समान एकीभाव होनेके कारण आत्मा नहीं-जानता; वहाँ प्रसङ्गानुसार यह-कहा गया था कि काम और-कर्मादिके समान स्वयं-ज्योतिष्ट्व भी इस आत्माका स्वभाव नहीं है, क्योंकि सुषुप्तिमें इसकी उपलब्धि नहीं होती, इस आशङ्काके प्राप्त होनेपर उसका निराकरण करनेके लिये 'स्त्री पुरुष' का दृष्टान्त देकर [ यह बतलाया गया था कि ]-एकी-भावरूप हेतुके कारण सुषुप्तिमें विद्यमान स्वयंज्योतिष्ट्वका ही ग्रहण नहीं होता, वह काम-कर्मादिके समान आगन्तुक नहीं है। |
| इत्येतत् प्रासङ्गिकमभिधाय यत् प्रकृतं तदेवानुप्रवर्तयति। अत्र चैतत् प्रकृतम्—अविद्याकामकर्मविनिर्मुक्तमेव तद् रूपम्, यत् सुषुप्तं आत्मनो गृह्यते प्रत्यक्षत | इस प्रकार इस प्रासङ्गिक स्वयं ज्योतिष्ट्वका निरूपण कर जो प्रकृत है, उसका ही श्रुति उल्लेख करती है। यहाँ प्रकरण यह है कि सुषुप्तिमें आत्माके जिस रूपका प्रत्यक्षतया ग्रहण किया जाता है, वह अविद्या, काम और कर्मसे रहित ही है।^२ |
१. इस एकीभाव या एकत्वका तात्पर्य पहले टिप्पणी (पृष्ठ ६७१) में बताया जा चुका है।
२. इस प्रसङ्गको समझनेके लिये पृष्ठ ६४५ और ६७२ की टिप्पणी देखिये।