बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 990, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ९७६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| इति। तदेतद् यथाभूतमेवाभिहितम्—सर्वसम्बन्धातीतमेतद् रूपमिति; यस्मादत्रैतस्मिन् सुषुप्तस्थाने अतिच्छन्दापहतपाप्माभयमेतद् रूपम्, तस्मात्— | अतः यह बात ठीक ही कही गयी है कि यह रूप सब प्रकारके-सम्बन्धोंसे परे है; चूँकि यहाँ इस सुषुप्त-स्थानमें यह रूप कामरहित, धर्माधर्म रहित और अभय होता है, इसलिये— |
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अत्र पितापिता भवति मातामाता लोका अलोका देवा अदेवा वेदा अवेदाः । अत्र स्तेनोऽस्तेनो भवति भ्रूणहाभ्रूणहा चाण्डालोऽचाण्डालः पौल्कसोऽपौल्कसः श्रमणोऽश्रमणस्तापसोऽतापसोऽनन्वागतं पुण्येनानन्वागतं पापेन तीर्णो हि तदा सर्वाञ्छोकान् हृदयस्य भवति ॥ २२ ॥
इस सुषुप्तावस्थामें पिता अपिता हो जाता है, माता अमाता हो जाती है, लोक अलोक हो जाते हैं, देव अदेव हो जाते हैं और वेद अवेद हो जाते हैं। यहाँ चोर अचोर हो जाता है, भ्रूणहत्या करनेवाला अभ्रूणहा हो जाता है, तथा चाण्डाल अचाण्डाल, पौल्कस अपौल्कस, श्रमण अश्रमण और तापस अतापस हो जाते हैं। उस समय यह पुरुष पुण्यसे असम्बद्ध तथा पापसे भी असम्बद्ध होता है और हृदयके सम्पूर्ण शोकोंको पार कर लेता है ॥ २२ ॥
| **अत्र पिता जनकः—**तस्य च जनयितृत्वाद् यत् पितृत्वं पुत्रं प्रति, तत् कर्मनिमित्तम्, तेन च कर्मणायमसम्बद्धोऽस्मिन् काले । तस्मात् पितापुत्रसम्बन्धनिमित्तात् कर्मणो विनिर्मुक्तत्वात् पिताप्यपिता भवति; तथा पुत्रोऽपि पितुःपुत्रो | यहाँ पिता अर्थात् जनक—जन्म देनेके कारण जो उसका पुत्रके प्रति पिताका भाव होता है, वह 'कर्म' रूप निमित्तसे है, उस कर्मसे इस कालमें ( सुषुप्तिमें ) यह असम्बद्ध रहता है। अतः पिता-पुत्र-सम्बन्धके हेतुभूत कर्मसे रहित होनेके कारण इस अवस्थामें पिता भी अपिता हो जाता है; इसी प्रकार पुत्र भी पिताका अपुत्र हो जाता है—ऐसा |
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