बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 991, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ९७७ |
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| भवतीति सामर्थ्याद् गम्यते; उभयोर्हि सम्बन्धनिमित्तं कर्म, तदयमतिक्रान्तो वर्तते; 'अपहतपाप्म' इति ( ४ । ३ । २१ ) ह्युक्तम् । | वाक्यके सामर्थ्यसे जाना जाता है; क्योंकि दोनोंहीके सम्बन्धका कारण कर्म है, उसका यह अतिक्रमण कर जाता है; क्योंकि इसके स्वरूपको 'अपहतपाप्म' ( पापरहित ) ऐसा कहा गया है । |
| तथा मातामाता, लोकाः कर्मणा जेतव्या जिताश्च--तत्कर्मसम्बन्धाभावाल्लोका अलोकाः। तथा देवाः कर्माङ्गभूताः--तत्कर्मसम्बन्धात्ययाद् देवा अदेवाः । तथा वेदाः साध्यसाधनसम्बन्धाभिधायकाः, मन्त्रलक्षणाश्चाभिधायकत्वेन कर्माङ्गभूताः, अधीता अध्येतव्याश्च—कर्मनिमित्तमेव सम्बध्यन्ते पुरुषेण; तत्कर्मातिक्रमणादेतस्मिन् काले वेदा अप्यवेदाः सम्पद्यन्ते । | इसी प्रकार माता अमाता हो जाती है। कर्मसे जीते जानेवाले तथा जीते हुए लोक, उस कर्मसम्बन्धके न रहनेके कारण अलोक हो जाते हैं। और कर्मके अङ्गभूत देवता, उस कर्मसम्बन्धका अतिक्रमण हो जानेके कारण देव अदेव हो जाते हैं। तथा साध्यसाधनसम्बन्धका वर्णन करनेवाले और अभिधायकरूपसे कर्मके अङ्गभूत मन्त्रात्मक वेद, वे अध्ययन किये हुए हों अथवा अध्ययन किये जानेवाले हों, कर्मके कारण ही पुरुषसे सम्बद्ध हैं; उस कर्मका अतिक्रमण करनेके कारण इस अवस्थामें वेद भी अवेद हो जाते हैं। |
| न केवलं शुभकर्मसम्बन्धातीतः, किं तर्हि ? अशुभैरप्यत्यन्तघोरैः कर्मभिरसम्बद्ध एवायं वर्तत इत्येतमर्थमाह—अत्र स्तेनो | [ उस अवस्थामें ] यह केवल शुभ कर्मके सम्बन्धसे ही परे नहीं होता, तो क्या बात है ? यह अशुभ अर्थात् अत्यन्त घोर कर्मोंसे भी असम्बद्ध ही रहता है—यही बात श्रुति बतलाती है—यहाँ चोर अर्थात् |
बृ० उ० ६२—