भारतकोश
बार्हस्पत्य सूत्र / अर्थशास्त्र (महर्षि बृहस्पति - प्राचीन दण्डनीति, राजधर्म एवं कूटनीति सटीक)

बार्हस्पत्य सूत्र / अर्थशास्त्र (महर्षि बृहस्पति - प्राचीन दण्डनीति, राजधर्म एवं कूटनीति सटीक)

Brihaspati Sutra or Barhaspatya Rajanitishastra with Commentary

महर्षि बृहस्पति (सम्पादक: डॉ. एफ. डब्ल्यू. थॉमस) द्वारा

DevanagariHindipublished100 पृष्ठ

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( 10 ) X. PARALLEL PASSAGES. (१) आत्मवान् राजा १।१   आत्मवान् नृपः । कामन्दकी नीतिसार २।३६ (२) कालिकाभिधान पाषण्डी २।१३ पाषण्डी । नीतिवाक्यामृत पृ० ८२ On this the commentary says कापालिकादि पाषण्डिनम् । (३) अर्थमर्थेन २।४६     अर्थेनार्थोपार्जनम् । नी० वा० अमृत पृ० ११९ (४) गुरुवचनमलङ्घनीयम् २।७३ गुरुवचनमनुल्लङ्घनीयम्। नी०वा० अमृत पृ० ४४ (५) अष्टादशतीर्थानि निरूपयेत  “सेनापतिर्गणको राजश्रेष्ठी ३।२२ दण्डाधिपो मन्त्री महत्तरो बल- वत्तरश्चत्वारो वर्णाश्च तुरङ्गबलं पुरोहितोऽमात्यो महामाहात्यश्चे- त्यष्टादश राज्ञां तीर्था भवन्ति ।” quoted by श्रुतसागरसूरि on p. 91 of यशस्तिलक Nirnayasagar edition. ब्राह्मे मुहूर्ते उत्थानम् । धर्म- A common saying of the मर्थञ्च चिन्तयेत् २।४।१।   Dharmashâstras. Cf. Manu IV. 92. (७) गजोऽगजेनेव ६।६    गजेन गजबन्धनमिव । नी० वा० अमृत पृ० ११९ (८) धनमूलं जगत् ६।१०    “धनमार्जय काकुत्स्थ धन मूलमिदं जगत्” । quoted by Ramchandra Budhendra on नीतिशतक 31 (Nirnayasagar edition 1917)