भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 115, कुल 978 में से

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पृष्ठ 115

खण्ड ८ ] शाङ्करभाष्यथ १११

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| ऋतेऽन्नात्” ( बृ० उ० ५ । १२ । १ ) इति हि श्रुतेः। “अन्नं दाम” ( बृ० उ० २ । २ । १ ) इति च। अन्नस्य का गतिरित्याप इति होवाच। अप्संभवत्वादन्नस्य ॥ ४ ॥ | “अन्नके बिना प्राण सूख जाता है” इस श्रुतिसे सिद्ध होता है तथा “अन्न यह [वत्सस्थानीय प्राणकी] रस्सी है” ऐसी श्रुति भी है। फिर ‘अन्नकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर दाल्भ्यने कहा—‘आप्’ क्योंकि अन्न आप् ( जल ) से ही उत्पन्न होनेवाला है ॥ ४ ॥ |

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अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाचामुष्य लोकस्य का गतिरिति न स्वर्गं लोकमतिनयेदिति होवाच स्वर्गं वयं लोक२सामाभिसंस्थापयामः स्वर्गस२-स्ताव२हि सामेति ॥ ५ ॥

‘जलकी गति क्या है ?’ ऐसा प्रश्न होनेपर उसने ‘वह लोक’ ऐसा कहा। ‘उस लोककी गति क्या है ?’ इसपर दाल्भ्यने कहा कि ‘स्वर्गलोकका अतिक्रमण करके सामको कोई किसी दूसरे आश्रयमें नहीं ले जा सकता। हम सामको स्वर्गलोकमें ही स्थित करते हैं, क्योंकि सामकी स्वर्गरूपसे स्तुति की गयी है’ ॥ ५ ॥

| अपां का गतिरित्यसौ लोक इति होवाच। अमुष्मान्लोकाद् वृष्टिः संभवति। अमुष्य लोकस्य का गतिः ? इति पृष्टो दाल्भ्य उवाच। स्वर्गममुं लोकमतीत्याश्रयान्तरं साम न नयेत्कश्चिदिति होवाच। | ‘जलोंकी गति क्या है ?’ इसपर दाल्भ्यने ‘वह लोक’ ऐसा कहा, क्योंकि उस लोकसे ही वृष्टि होनी सम्भव है। ‘उस लोककी क्या गति है ?’ ऐसा पूछे जानेपर दाल्भ्यने कहा—‘उस स्वर्गलोकका अतिक्रमण करके कोई सामको किसी दूसरे आश्रयमें नहीं ले जा सकता।’ |

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