छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 116, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 116
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| ११२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| अतो वयमपि स्वर्गं लोकं सामाभिसंस्थापयामः। स्वर्गलोकप्रतिष्ठं साम जानीम इत्यर्थः। स्वर्गसंस्तावं स्वर्गत्वेन संस्तवनं संस्तावो यस्य तत्साम स्वर्गसंस्तावं हि यस्मात् "स्वर्गो वै लोकः साम वेद" इति श्रुतिः ॥५॥ | अतः हम भी सामको स्वर्गलोकमें ही स्थापित करते हैं। अर्थात् सामको स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित समझते हैं, क्योंकि साम स्वर्गसंस्ताव अर्थात् जिसका स्वर्गरूपसे संस्तवन किया गया है, ऐसा स्वर्गसंस्ताव है "निश्चय स्वर्गलोक ही साम है ऐसा जानता है" यह श्रुति भी है ॥ ५ ॥ |
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तंह शिलकः शालावत्यश्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाचाप्रतिष्ठितं वै किल ते दाल्भ्य साम यस्त्वेतर्हि ब्रूयान्मूर्धा ते विपतिष्यतीति मूर्धा ते विपतेदिति ॥६॥
उस चिकितानपुत्र दालभ्यसे शालवान्के पुत्र शिलकने कहा—'हे दालभ्य ! तेरा साम निश्चय ही अप्रतिष्ठित है। जो इस समय कोई सामवेत्ता यह कह दे कि 'तेरा मस्तक पृथिवीपर गिर जाय' तो निश्चय ही तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ ६ ॥
| तमितरः शिलकः शालावत्य- | उस चैकितायन दाल्भ्यसे दूसरे |
| श्चैकितायनं दाल्भ्यमुवाच— | शालावत्य शिलकने कहा—'हे दाल्भ्य ! निश्चय ही तेरा साम |
| अप्रतिष्ठितमसंस्थितं परावरीय- | अप्रतिष्ठित-असंस्थित अर्थात् उत्तरोत्तर उत्कृष्टरूपसे असमाप्त गतिवाला |
| स्त्वेनासमामगति सामेत्यर्थः। वा | है।' 'वै' और 'किल' इन निपातों- |
| इत्यागमं स्मारयति किलेति च। | से श्रुति आगम यानी उपदेश- |
| दाल्भ्य ते तव साम। यस्त्व- | परम्पराका स्मरण कराती है। यदि |
| सहिष्णुः सामविदेतर्ह्येतस्मिन्काले | इस समय कोई असहिष्णु सामवेत्ता अप्रतिष्ठित सामको 'यह प्रतिष्ठित |