छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 143, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 143
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खण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १३९
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| यणो ह्यसौ। वस्तुविषये क्रियास्विव विकल्पानुपपत्तेः। <br><br> “द्विनामा द्विगोत्रः” इत्यादि हि स्मृतिः। दृश्यते चोभयतः पिण्डभाक्त्वम्। उद्गीथे बद्धचित्त्वाद्दृष्टावनादराद्वा वाशब्दः स्वाध्यायर्थः। स्वाध्यायं कर्तुं ग्रामाद्बहिरुद्वव्राजोद्गतवान्विविक्तदेशस्थोदकाभ्याशम्। | (और) के अर्थमें हैं। अवश्य ही वह द्व्यामुष्यायण है, क्योंकि वस्तुके विषयमें क्रियाओंके समान विकल्प होना सम्भव नहीं है। <br><br> “द्विनामा द्विगोत्रः” इत्यादि वाक्य स्मृतिमें प्रसिद्ध भी है। [जिस गोत्रमें पुत्र उत्पन्न होता है और जहाँ वह धर्मपूर्वक गोद लिया जाता है उन] दोनोंका उससे पिण्डग्रहण करना लोकमें भी देखा ही जाता है। अथवा उद्गीथविद्यामें बद्धचित्त होनेसे ऋषियोंमें अनादर होनेके कारण ‘वा’ शब्दका प्रयोग स्वाध्यायके लिये किया गया है। |
| उद्वव्राज प्रतिपालयाञ्चकारेति चैकवचनाल्लिङ्गादेकोऽसावृषिः। श्रोद्गीथकालप्रतिपालनादृषेःस्वाध्यायकरणमन्नकामनयेति लक्ष्यत इत्यभिप्रायः॥१॥ | ‘उद्वव्राज’ और ‘प्रतिपालयाञ्चकार’ इन क्रियाओंमें एकवचन होनेसे सिद्ध होता है कि यह एक ही ऋषि है। [तृतीय मन्त्रमें कथित] श्वानोंके उद्गीथकालकी प्रतीक्षा करनेसे तात्पर्यतः यह लक्षित होता है कि ऋषिका स्वाध्याय करना अन्नकी कामनासे है॥ १॥ |
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