छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२ ] शाङ्करभाष्याथ १४१
उनसे उस (श्वेत श्वान) ने कहा—'तुम प्रातःकाल यहीं मेरे पास आना।' तब दाल्भ्य बक अथवा मैत्रेय ग्लाव उनकी प्रतीक्षा करता रहा ॥ ३ ॥
| एवमुक्ते श्वा श्वेत उवाच तान्क्षुल्लकाञ्श्वन इहैवास्मिन्नेव देशे मा मां प्रातः प्रातःकाल उपसमीयातेति । दैर्घ्यं छान्दसं समीयातेति प्रमादपाठो वा । प्रातःकालकरणं तत्काल एव कर्तव्यार्थम् । अन्नदस्य वा सवितुरपराह्णेऽनाभिमुख्यात् ।<br><br>तत्तत्रैव ह बको दाल्भ्यो ग्लावो वा मैत्रेय ऋषिः प्रतिपालयाञ्चकार प्रतीक्षणं कृतवानित्यर्थः ॥ ३ ॥ | ऐसा कहे जानेपर श्वेत कुत्तेने उन छोटे-छोटे कुत्तोंसे कहा—तुम प्रातःकाल इसी स्थानपर मेरे पास आना। 'समीयात' इस क्रियापदमें दीर्घपाठ छान्दस है अथवा प्रमादके कारण है। प्रातःकालकी जो नियुक्ति की गयी है वह उसी समय उद्गानकी कर्तव्यता सूचित करनेके लिये अथवा मध्याह्नोत्तर कालमें अन्नदाता सूर्य उद्गाताके सम्मुख नहीं रहता—यह सूचित करनेके लिये है।<br><br>तब दाल्भ्य बक अथवा मैत्रेय ग्लाव नामक ऋषि उसी स्थानपर 'प्रतिपालयाञ्चकार'–प्रतीक्षा करता रहा–यह इसका तात्पर्य है ॥ ३ ॥ |
— : o : —
ते ह यथैवेह बहिष्पवमानेन स्तोष्यमाणाः सँरब्धाःसर्पन्तीत्येवमाससृपुस्ते ह समुपविश्य हिं चक्रुः॥४॥
उन कुत्तोंने, जिस प्रकार कर्ममें बहिष्पवमान स्तोत्रसे स्तवन करनेवाले उद्गाता परस्पर मिलकर भ्रमण करते हैं उसी प्रकार भ्रमण किया और फिर वहाँ बैठकर हिंकार करने लगे ॥ ४ ॥