छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 245, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१
| दिविक्षिद्भ्य इत्येवमादि समानमन्यत् । विन्दतापहतेति बहुवचनमात्रं विशेषः । याजमानं त्वेतत् । एतास्म्यत्र यजमान इत्यादिलिङ्गात् ॥ १४-१५ ॥ | ‘दिविक्षिद्भ्यः’ इत्यादि शेष सब अर्थ पहलेके ही समान है। ‘विन्दत, अपहत’ इन क्रियाओंमें बहुवचन होना ही पूर्वकी अपेक्षा विशेष है। ये मन्त्र यजमान-सम्बन्धी हैं, क्योंकि ‘मैं यजमान इस लोकको प्राप्त करनेवाला हूँ’ इत्यादि लिङ्गसे यह स्पष्ट होता है ॥ १४-१५ ॥ |
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तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयसवनँ सम्प्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद य एवं वेद य एवं वेद ॥ १६ ॥
उस (यजमान) को आदित्य और विश्वेदेव तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है वह निश्चय ही यज्ञकी मात्रा (यज्ञके यथार्थ स्वरूप) को जानता है ॥ १६ ॥
| एष ह वै यजमान एवंविद् यथोक्तस्य सामादेर्विद्वान्यज्ञस्य मात्रां यज्ञयाथात्म्यं वेद यथोक्तम्। य एवं वेद य एवं वेदेति द्विरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था ॥ १६ ॥ | एवंवित्—इस प्रकार पूर्वोक्त सामादिको जाननेवाला यह यजमान निश्चय ही यज्ञकी मात्रा—यज्ञके पूर्वोक्त यथार्थ स्वरूपको जानता है। ‘य एवं वेद य एवं वेद’ यह द्विरुक्ति अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥ १६ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि द्वितीयाध्याये
चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ २४ ॥
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इति श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्य-
श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्यविवरणे
द्वितीयोऽध्यायः सम्पूर्णः ॥ २ ॥
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