छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 247, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
| र्थेभ्यः श्रेष्ठतमफलं विधास्यामी-<br><br>त्येवमारभते श्रुतिः— | का, जो सम्पूर्ण पुरुषार्थोंसे श्रेष्ठतम फलवाली है, विधान करूँगी—इस उद्देश्यसे श्रुति आरम्भ करती है— |
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आदित्यादिमें मधु आदि-दृष्टि
ॐ असौ वा आदित्यो देवमधु तस्य द्यौरेव तिरश्चीनवँशोऽन्तरिक्षमपूपो मरीचयः पुत्राः ॥ १ ॥
ॐ यह आदित्य निश्चय ही देवताओंका मधु है। द्युलोक ही उसका तिरछा बाँस है [ जिसपर कि वह लटका हुआ है ], अन्तरिक्ष छत्ता है और किरणें [ उसमें रहनेवाले ] मक्खियोंके बच्चे हैं ॥ १ ॥
| असौ वा आदित्यो देवम-<br><br>ध्वित्यादि । देवानां मोदना-<br><br>न्मध्विव मध्वसावादित्यः ।<br><br>वस्वादीनां च मोदनहेतुत्वं वक्ष्यति सर्वयज्ञफलरूपत्वादादि-<br><br>त्यस्य । | ‘असौ वा आदित्यो देवमधु’ इत्यादि। देवताओंको प्रसन्न करने-वाला होनेसे वह आदित्य मधुके समान मानो मधु है। वसु आदिको प्रसन्न करनेमें उसकी हेतुताका श्रुति आगे ( ३।६।१ में ) प्रतिपादन करेगी, क्योंकि वह आदित्य सम्पूर्ण यज्ञोंका फलरूप है। | | कथं मधुत्वम् ? इत्याह—तस्य<br><br>मधुनो द्यौरेव भ्रामरस्येव मधु-<br><br>नस्तिरश्चीनश्चासौ वंशश्चेति तिर-<br><br>श्चीनवंशः। तिर्यग्गतेव हि द्यौर्ल-<br><br>क्ष्यते । अन्तरिक्षं च मध्वपूपो | इसका मधुत्व किस प्रकार है ! यह श्रुति बतलाती है—मधुकरके मधुके समान इस मधुका द्युलोक ही तिरछा बाँस है। जो तिरश्चीन (तिरछा) हो और वंश ( बाँस ) हो उसे तिरश्चीनवंश (तिरछा बाँस) कहते हैं; क्योंकि द्युलोक तिरछा ही दिखायी देता है। तथा अन्तरिक्ष मधुका छत्ता है, वह द्युलोकरूप बाँसमें लगकर |