भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 978 में से

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पृष्ठ 255

तृतीय खण्ड

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आदित्यकी पश्चिमदिक्सम्बन्धिनी किरणोंमें मधुनाड्यादि-दृष्टि

अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयस्ता एवास्य प्रतीच्यो मधुनाड्यः सामान्‍येव मधुकृतः सामवेद एव पुष्पं ता अमृता आपः ॥ १ ॥

तथा ये जो इसकी पश्चिम ओरकी रश्मियाँ हैं वे ही इसकी पश्चिमीय मधुनाडियाँ हैं। सामश्रुतियाँ ही मधुकर हैं, सामवेदविहित कर्म ही पुष्प है तथा वह [ सोमादिरूप ] अमृत ही आप.है ॥ १ ॥

तानि वा एतानि सामान्‍येतग्ँसामवेदमभ्यतपग्ँस्तस्याभितप्तस्य यशस्तेज इन्द्रियं वीर्यमन्नाद्यग्ँरसोऽजायत ॥ २ ॥

उन इन सामश्रुतियोंने ही इस सामवेदविहित कर्मका अभिताप किया। उस अभितप्त सामवेदसे ही यश, तेज, इन्द्रिय, वीर्य और अन्नाद्यरूप रस उत्पन्न हुआ ॥ २ ॥

तद्व्यक्षरत्तदादित्यमभितोऽश्रयत्तद्वा एतद्यदेतदादित्यस्य कृष्णग्ँरूपम् ॥ ३ ॥

उस रसने विशेषरूपसे गमन किया और आदित्यके समीप [पश्चिम] भागमें आश्रय लिया। यह जो आदित्यका कृष्ण तेज है यह वही है ॥ ३ ॥

| अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मय इत्यादि समानम्। तथा साम्नां मधु एतदादित्यस्य कृष्णं रूपम् ॥ १–३ ॥ | ‘अथ येऽस्य प्रत्यञ्चो रश्मयः’इत्यादि श्रुतियोंका अर्थ पूर्ववत है। तथा सामश्रुतियोंका जो मधु है वही यह आदित्यका कृष्ण तेज है ॥१-३॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि तृतीयाध्याये
तृतीयखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ३ ॥