भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 978 में से

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पृष्ठ 309
खण्ड १४ ]शाङ्करभाष्यार्थ३०५
शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
नान्यथेत्यविचलः प्रत्ययस्तं क्रतुं कुर्वीतोपासीतेत्यनेन व्यवहितेन संबन्धः । किं पुनः क्रतुकरणेन कर्तव्यं प्रयोजनम् ? कथं वा क्रतुः कर्तव्यः ? क्रतुकरणं चाभिप्रेतार्थसिद्धिसाधनं कथम् ? इत्यस्यार्थस्य प्रतिपादनार्थमथेत्यादिग्रन्थः ।को कहते हैं अर्थात् यह ऐसा ही है, इससे अन्य प्रकारका नहीं है—ऐसी जो अविचल प्रतीति है वही क्रतु है, उस क्रतुको करे—इस प्रकार इसका व्यवधानयुक्त ‘उपासीत’ इस क्रियासे सम्बन्ध है । किंतु उस क्रतुके करनेसे क्या प्रयोजन सिद्ध करना है ? अथवा किस प्रकार वह क्रतु करना चाहिये तथा वह क्रतु करना किस प्रकार अभीष्ट अर्थकी सिद्धिका साधन है ? इस सब विषयका प्रतिपादन करनेके लिये ही ‘अथ’ इत्यादि आगेका ग्रन्थ है ।
अथ खल्विति हेत्वर्थः । यस्मात् क्रतुमयः क्रतुप्रायोऽध्यवसायात्मकः पुरुषो जीवः; यथाक्रतुर्यादृशः क्रतुरस्य सोऽयं यथाक्रतुर्यथाध्यवसायो यादृङ्निश्चयोऽस्मिंल्लोके जीवन्निह पुरुषो भवति, तथेतोऽस्माद्देहात्प्रेत्य मृत्वा भवति; क्रत्वनुरूपफलात्मको भवतीत्यर्थः । एवं ह्येतच्छास्त्रतो दृष्टम्—‘‘यं यं वापि‘अथ खलु’ यह पदसमूह हेतुके लिये है । क्योंकि पुरुष यानी जीव क्रतुमय—क्रतुप्राय अर्थात् अध्यवसायात्मक है, इसलिये इस लोकमें जीवित रहता हुआ यह पुरुष यथाक्रतु—जिस प्रकारके क्रतुवाला होता है अर्थात् जिस प्रकारके अध्यवसायवाला—जैसे निश्चयवाला होता है, वैसे ही यहाँसे—इस देहसे ‘प्रेत्य’—मरकर होता है । तात्पर्य यह है कि वह अपने निश्चयके अनुसार फलवाला होता है । शास्त्रसे भी यह बात ऐसी ही देखी गयी है—‘‘जिस-
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