छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 369, कुल 978 में से
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खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| सेयं हारेत्वा गोभिः सह तवैवास्तु तवैव तिष्ठतु, न ममापर्याप्तेन कर्मार्थमनेन प्रयोजनमित्यभिप्रायः, हे शूद्रेति । | उसे 'हारेत्वा' कहते हैं, वह यह गौओंके सहित 'हारेत्वा' तेरा ही रहे। तात्पर्य यह है कि हे शूद्र ! जो कर्मके लिये अपर्याप्त है ऐसे इस धनसे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। |
| ननु राजासौ क्षत्तृसम्बन्धात्स ह क्षत्तारमुवाचेत्युक्तम् । विद्याग्रहणाय च ब्राह्मणसमीपोपगमाच्छूद्रस्य चानधिकारात्कथमिदमननुरूपं रैक्वेणोच्यते हे शूद्रेति ? | शङ्का-क्षत्ता (सेवक) से सम्बन्ध होनेके कारण यह जानश्रुति तो राजा है, क्योंकि 'स ह क्षत्तारमुवाच' (उसने सेवकसे कहा) ऐसा पहले कहा जा चुका है। तथा शूद्रका अधिकार न होनेसे ब्राह्मणके समीप विद्याग्रहणके लिये जानेके कारण भी [ यह क्षत्रिय ही जान पड़ता है ] फिर रैक्वने 'हे शूद्र' ऐसा अनुचित शब्द क्यों कहा ? |
| तत्राहुराचार्याः—हंसवचनश्रवणाच्छुगेनमाविवेश; तेनासौ शुचा, श्रुत्वा रैक्वस्य महिमानं वा आद्रवतीति ऋषिरात्मनः परोक्षज्ञतां दर्शयंञ्छूद्रेत्याहेति। शूद्रवद्वा धनेनैवैनं विद्याग्रहणायोपजगाम | समाधान-इस विषयमें आचार्यगण ऐसा कहते हैं कि हंसका वचन सुननेपर इस जानश्रुतिमें शोकका आवेश हो गया था। उस शोकसे अथवा रैक्वकी महिमा सुनकर वह द्रवीभूत हो रहा था; इसलिये ऋषिने अपनी परोक्षज्ञता प्रदर्शित करनेके लिये उसे 'शूद्र' कहकर सम्बोधित किया। अथवा वह शूद्रके समान केवल धनके द्वारा ही विद्या ग्रहण करनेके लिये उसके समीप गया था, शुश्रूषाद्वारा ग्रहण करने नहीं गया |