भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 402, कुल 978 में से

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पृष्ठ 402
३९८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ४

| निश्चिन्तः कृतार्थो ब्रह्मविद्भवति अत आचार्यों ब्रह्मविदिव भासीति को न्विति वितर्कयन्नुवाच कस्त्वामनुशशासेति ।<br><br>स चाह सत्यकामोऽन्ये मनुष्येभ्यो देवता मामनुशिष्टवत्यः, कोऽन्यो भगवच्छिष्यं मां मनुष्यः सन्ननुशासितुमुत्सहेतेत्यभिप्रायः । अतोऽन्ये मनुष्येभ्य इति ह प्रतिजज्ञे प्रतिज्ञातवान् । भगवांस्त्वेव मे कामे ममेच्छायां ब्रूयात्किमन्यैरुक्तेन नाहं तद्गणयामीत्यभिप्रायः॥२॥ | वाला और चिन्तारहित हुआ करता है इसीसे आचार्यने कहा कि 'तू ब्रह्मवेत्ता-सा प्रतीत होता है, और 'को नु' इस प्रकार वितर्क करते हुए पूछा 'तुझे किसने उपदेश दिया है?'<br><br>उस सत्यकामने कहा—'मनुष्योंसे अन्य देवताओंने मुझे उपदेश दिया है।' तात्पर्य यह है कि 'मनुष्य होनेपर तो मुझ श्रीमान्‌के शिष्यको उपदेश करनेका साहस ही कौन कर सकता है?' अतः उसने यही प्रतिज्ञा की कि 'मुझे मनुष्योंसे अन्यने उपदेश किया है।' 'अब मेरी इच्छाके अनुसार भगवान् ही मुझे उपदेश करें, औरोंके कहे हुएसे मुझे क्या लेना है?' अभिप्राय यह है कि 'मैं उसे कुछ भी नहीं समझता' ॥ २ ॥ |

—:० :—

किं च—। यही नहीं—

श्रुतँह्येव मे भगवद्दृशेभ्य आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापतीति तस्मै हैतदेवोवाचात्र ह न किञ्चन वीयायेति वोयायेति ॥ ३ ॥

'मैंने श्रीमान्-जैसे ऋषियोंसे सुना है कि आचार्यसे जानी गयी विद्या ही अतिशय साधुताको प्राप्त होती है।' तब आचार्यने उसे उसी विद्याका उपदेश किया। उसमें कुछ भी न्यून नहीं हुआ, न्यून नहीं हुआ [ अर्थात् उसकी विद्या पूर्ण ही रही ] ॥ ३ ॥