भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 403
खण्ड ९ ]शाङ्करभाष्यम्३१९

| श्रुतं हि यस्मान्मम विद्यत एवास्मिन्नर्थे भगवद्दृशेभ्यो भगवत्समेभ्य ऋषिभ्यः, आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं साधुतमत्वं प्रापति प्राप्नोतीत्यतो भगवानेव ब्रूयादित्युक्त आचार्योऽब्रवीत्तस्मै तामेव दैवतैरुक्तां विद्याम् । अत्र ह न किञ्चन षोडशकलविद्यायाः किञ्चिदेकदेशमात्रमपि न वीयाय न विगतमित्यर्थः । द्विरभ्यासो विद्यापरिसमाप्त्यर्थः ॥ ३ ॥ | ‘क्योंकि इस विषयमें भगवान्—श्रीमन्‌के सदृश ऋषियोंसे मेरा यही सुना हुआ है कि आचार्यसे जानी गयी विद्या ही अतिशय साधुताको प्राप्त होती है। अतः अब श्रीमान् ही मुझे उपदेश करें।’ ऐसा कहे जानेपर आचार्यने उसे देवताओंद्धारा कही हुई उसी विद्याका उपदेश किया। उसमें अर्थात् उस षोडश कलाओंवाली विद्यामें कुछ भी—उसका एकदेश भी व्यययुक्त यानी विगत नहीं हुआ अर्थात् उसकी विद्या पूर्ण ही रही। ‘वीया५ वीयाय’ यह द्विरुक्ति विद्याकी समाप्तिके लिये है ॥ ३ ॥ |


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इतिच्छान्दोग्योपनिषदि चतुर्थाध्याये नवमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ९ ॥