भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 978 में से

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पृष्ठ 404

दशम खण्ड

उपकोसलके प्रति अग्निद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश

| पुनर्ब्रह्मविद्यां प्रकारान्तरेण वक्ष्यामीत्यारभते गतिं च तद्विदोऽग्निविद्यां च। आख्यायिका पूर्ववच्छ्रद्धातपसोर्ब्रह्मविद्यासाधनत्वप्रदर्शनार्था। | पुनः अन्य प्रकारसे ब्रह्मविद्याका निरूपण करना है, इसलिये तथा ब्रह्मवेत्ताकी गति और अग्निविद्या भी बतलानी है, इसलिये श्रुति आरम्भ करती है। यहाँ जो आख्यायिका है वह पूर्ववत् श्रद्धा और तपका ब्रह्मविद्यामें साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है। |

उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास तस्य ह द्वादशवर्षाण्यग्नीन्परिचचार स ह स्मान्यानन्तेवासिनः समावर्तयंस्तꣳह स्मैव न समावर्तयति ॥ १ ॥

उपकोसलनामसे प्रसिद्ध कमलका पुत्र सत्यकाम जाबालके यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके रहता था। उसने बारह वर्षतक उस आचार्यके अग्नियोंकी सेवा की; किंतु आचार्यने अन्य ब्रह्मचारियोंका तो समावर्तन संस्कार कर दिया, किंतु केवल इसीका नहीं किया ॥ १ ॥

| उपकोसलो ह वै नामतः कमलस्यापत्यं कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास। तस्य ह ऐतिह्यार्थः। तस्याचार्यस्य द्वादशवर्षाण्यग्नीन्परिचचाराग्नी- | कमलके पुत्र कामलायनने, जिसका नाम उपकोसल था, सत्यकाम जाबालके यहाँ ब्रह्मचर्यपूर्वक वास किया। 'तस्य ह' इसमें ह ऐतिह्यके लिये है। उसने बारह वर्षोंतक उस आचार्यके अग्नियोंकी |