भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 978 में से

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पृष्ठ 409

खण्ड १०] शाङ्करभाष्यार्थ ४०५


संस्कृत-भाष्यम्भाष्यार्थ
त्वमेव कस्माद्ब्रह्मचारिणोऽज्ञानम् ।हैं; फिर ब्रह्मचारीको उनका अज्ञान कैसे रहा ?
नूनं सुखस्य कंशब्दवाच्यस्य तदीयश्शङ्काया युक्तत्वम् क्षणप्रध्वंसित्वात्खंशब्दवाच्यस्य चाकाशस्याचेतनस्य कथं ब्रह्मत्वमिति मन्यते, कथं च भवतां वाक्यमप्रमाणं स्यादिति; अतो न विजानामीत्याह ।**समाधान—**निश्चय ब्रह्मचारी यही मानता है कि 'क' शब्दका वाच्य सुख क्षणप्रध्वंसी होनेके कारण और 'ख' शब्दका वाच्य आकाश अचेतन होनेसे किस प्रकार ब्रह्म हो सकता है ? और आपका वचन भी कैसे अप्रमाणिक होगा ? इसीसे उसने कहा कि 'मैं नहीं जानता' ।
तमेवमुक्तवन्तं ब्रह्मचारिणं अग्निकर्तृकं ते हाग्नय ऊचुः । समाधानम् यद्भाव यदेव वयं कमवोचाम तदेव खमाकाशमिति । एवं खेन विशेष्यमाणं कं विषयेन्द्रियसंयोगजात्सुखान्निवर्तितं स्यान्नीलेनेव विशेष्यमाणमुत्पलं रक्तादिभ्यः । यदेव खमित्याकाशमवोचाम तदेव च कं सुखमिति जानीहि । एवं च सुखेन विशेष्यमाणं खं भौतिकादचेतनात्खान्निवर्तितं स्यान्नीलो-इस प्रकार कहते हुए उस ब्रह्मचारीसे अग्नियोंने कहा—'हम जिसे 'क' ऐसा कहकर पुकारते हैं वही 'ख' यानी आकाश है । इस प्रकार जैसे 'नील' इस विशेषणसे युक्त कमल रक्तकमलआदिसे विलग कर दिया जाता है, उसी प्रकार 'ख' शब्दसे विशेषित क' विषय और इन्द्रियोंके सहयोगसे होनेवाले सुखसे निवृत्त कर दिया जाता है । जिसे हम 'ख'—आकाश कहते हैं उसीको तू 'क'—सुख जान । इस प्रकार नीलोत्पलके समान ही 'सुखसे विशेषित किया हुआ 'ख' (आकाश) भौतिक अचेतन 'ख' से निवृत्त कर दिया जाता है । तात्पर्य यह है कि