छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 424, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 424
पञ्चदश खण्ड
आचार्यका उपदेश—नेत्रस्थित पुरुषकी उपासना
य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति । तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति ॥ १ ॥
‘यह जो नेत्रमें पुरुष दिखाई देता है यह आत्मा है’—ऐसा उसने कहा ‘यह अमृत है, अभय है और ब्रह्म है।’ उस (पुरुषके स्थानरूप नेत्र) में यदि घृत या जल डाले तो वह पलकोंमें ही चला जाता है ॥१॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते निवृत्तचक्षुर्भिर्रह्मचर्यादिसाधनसंपन्नैः शान्तैर्विवेकिभिर्दृष्टेर्द्रष्टा, “चक्षुषश्चक्षुः” (के०उ० १।२) इत्यादिश्रुत्यन्तरात् । | ‘जिनका बाह्य इन्द्रियग्राम निवृत्त हो गया है उन ब्रह्मचर्यादि साधन-सम्पन्न, शान्तात्मा विवेकियोंद्वारा जो यह नेत्रके अन्तर्गत दृष्टिका द्रष्टा पुरुष देखा जाता है, जैसा कि “वह चक्षुओंका चक्षु है” ऐसी अन्य श्रुतिसे प्रमाणित होता है’ [वह प्राणियोंका आत्मा है—ऐसा आचार्यने कहा ।] |
| नन्वग्निभिरुक्तं वितथं यत आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति गतिमात्रस्य वक्तेत्यवोचन्भविष्यद्विषयापरिज्ञानं चाग्नीनाम् । | शङ्का—[आचार्यके इस कथनसे अग्नियोंका कथन मिथ्या प्रमाणित होता है, क्योंकि उन्होंने तो ‘आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता’ ऐसा कहकर ‘केवल गतिमात्र कहलावेंगे’ इतना ही कहा था। तथा इससे अग्नियोंका भविष्यद्विषयसम्बन्धी ज्ञान न होना सिद्ध होता है । |