छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ४२१
| नैष दोषः; सुखाकाशस्यैवाक्षिणि दृश्यत इति द्रष्टुरनुवादात् । एष आत्मा प्राणिनामिति होवाचैवमुक्तवानेतद्यदेवात्मतत्त्वमवोचाम एतदमृतममरणधर्म्यविनाशयत एवाभयं यस्य हि विनाशाशङ्का तस्य भयोपपत्तिस्तदभावादभयमत एवैतद्ब्रह्म बृहदनन्तमिति ।<br><br>किञ्चास्य ब्रह्मणोऽक्षिपुरुषस्य माहात्म्यं तत्तत्र पुरुषस्य स्थानेऽक्षिणि यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति पक्ष्मावेव गच्छति न चक्षुषा संबध्यते पद्मपत्रेणेवोदकम् । स्थानस्याप्येतन्माहात्म्यं किं पुनः स्थानिनोऽक्षिपुरुषस्य निरञ्जनत्वं वक्तव्यमित्यभिप्रायः ॥ १ ॥ | समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि ऐसा कहकर आचार्यने [ अग्नियोंके बतलाये हुए ] सुखाकाशरूप द्रष्टाका ही 'जो नेत्रमें दिखायी देता है' इस प्रकार अनुवाद किया है । यह प्राणियोंका आत्मा है 'इति होवाच'—इस प्रकार कहा । जिस आत्मतत्त्वका वर्णन हम पहले कर चुके हैं वही यह अमृत—अमरणधर्मा यानी अविनाशी है; इसीसे अभय भी है, क्योंकि जिसके नाशकी शङ्का होती है उसीको भय हो सकता है; अतः उसका अभाव होनेके कारण यह अभय है । इसीसे यह ब्रह्म—बृहत् यानी अनन्त है ।<br><br>तथा इस ब्रह्म—नेत्रस्थ पुरुषका ऐसा माहात्म्य है कि इस रुषके स्थानभूत नेत्रमें यदि घृत या जल डाला जाय तो वह इधर-उधर पलकोंमें ही चला जाता है; पद्मपत्र-से जलके समान नेत्रसे उसका सम्बन्ध नहीं होता। जब कि स्थानका भी ऐसा माहात्म्य है तो स्थानी नेत्रस्थ पुरुषकी निःसङ्गताके विषयमें तो कहना ही क्या है ? यह इसका अभिप्राय है ॥ १ ॥ |
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